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Showing posts from February, 2026

"क्या है साहित्य " - डॉ. दक्षा जोशी 'निर्झरा'

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 "क्या है साहित्य " साहित्य क्या है? 'हितेन सहितेन इति साहित्यम्' अर्थात्, जिसमें सबका 'हित' समाहित हो, वही 'साहित्य' है। साहित्य का अर्थ केवल पुस्तकों के पन्ने नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदनाओं का वाणी में रूपांतरण है। साहित्य समाज का दर्पण है और जीवन का मार्गदर्शक प्रकाश-स्तंभ (Light House) है। साहित्य और समाज एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। समाज में जो घटनाएँ घटित होतीं हैं, वे साहित्य में प्रतिबिंबित होती हैं और साहित्य के माध्यम से समाज में वांछित परिवर्तन लाया जा सकता है। इसीलिए कहा गया है कि क़लम की धार बरछी (भाले) की धार से भी अधिक पैनी होती है। भारत का स्वतंत्रता संग्राम और रूस की क्रांति इसके सटीक उदाहरण हैं। टैगोर की पंक्तियाँ हैं— 'जहाँ चित्त भयमुक्त हो' (Where the mind is without fear)। यह हमें सिखाती हैं कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह हमें आंतरिक रूप से मज़बूत बनाता है। साहित्य पढ़ने वाला व्यक्ति कभी अकेला नहीं होता। वह पात्रों के माध्यम से विश्व के हर कोने के मानव की वेदना और संवेदना को समझ सकता है। यही 'सहानुभूत...

महा श्रृंगार छंद - ।। होली।।

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  महा श्रृंगार छंद  ।। होली।। सेठ सांवरिया के सुन बोल, दौड़ कर आये है नर नार। हरो दुविधा मन की हे!नाथ, प्यार का दे सबको उपहार।। देखकर मुख तेरा घनश्याम, जगी है दिल में फिर से आस। खेलकर होली सबके साथ, पुरातन वहीं रचाओ रास।।  तनिक बरसाकर सबपर रंग, सभी की नैया करदो पार। सेठ सांवरिया के सुन बोल, दौड़कर आये है नर नार।।  सजी सेठानी राधा साथ, हाथ में लेकर लाल गुलाल। सुनाते मुरलीधर जब तान, बदल जाती राधा की चाल।। सजाती खूब दिलों पर रंग, खेलकर होली का त्योंहार। सेठ सांवरिया के सुन बोल,  दौड़कर आये है नर नार।।                     दैनिक अमर उजाला से साभार रचनाकार श्योराज बम्बेरवाल 'सेवक' मालपुरा टोंक

अपनी अपनी राह

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भूमिका जीवन की यात्रा में प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी राह का पथिक होता है। कोई संघर्षों से घबराकर ठहर जाता है, तो कोई उन्हीं संघर्षों को सीढ़ी बनाकर अपनी मंजिल की ओर बढ़ता है। प्रस्तुत कविता “अपनी-अपनी राह” इसी आत्मविश्वास, आत्मजागरण और आत्मनिर्माण की प्रेरक चेतना को स्वर देती है। यह केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि जीवन के प्रति एक जाग्रत दृष्टिकोण है—जहाँ निराशा को आशा में बदलने का साहस है, और परिस्थितियों से ऊपर उठकर स्वयं का इतिहास रचने का संदेश भी। कवि मुकेश कुमावत 'मंगल' ने इस रचना में मानव जीवन के मूल सत्य को अत्यंत सरल किन्तु प्रभावशाली शैली में प्रस्तुत किया है। कविता का प्रत्येक पद पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है—क्या हम अपनी राह स्वयं चुनते हैं या दूसरों की नकल में भटक जाते हैं? क्या हम चुनौतियों से डरते हैं या उन्हें अपना शिक्षक बना लेते हैं? इस काव्य में संघर्ष, सत्य, परिश्रम, स्वाभिमान और पारिवारिक संस्कारों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। “माॅं के दूध को मत लजा, पिता की पाग मत झुका” जैसी पंक्तियाँ केवल प्रेरणा ही नहीं देतीं, बल्कि मनुष्य को उसके मूल मूल्यो...

प्रोफेसर राकेश राणा का आत्मकथ्य

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  प्रोफेसर राकेश राणा का आत्मकथ्य दिनांक 27-28 फरवरी, 2026 को रसायन विज्ञान विभाग, एम.एम.एच. कॉलेज, गाजियाबाद द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी “क्लाइमेट चेंज एंड सोशल जस्टिस: चैलेंजेस एंड सॉल्यूशंस ऑफ एनवायरनमेंटल जस्टिस” में सहभागिता मेरे लिए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं प्रेरणादायी अनुभव रहा। इस संगोष्ठी का आयोजन आई.सी.एस.एस.आर., निक्सी, दिल्ली; आई.आई.एम., नई दिल्ली तथा सेंट्रल बैंक के सहयोग से किया गया था। उद्घाटन सत्र का वातावरण अत्यंत गरिमामय था। दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वंदना से कार्यक्रम का प्रारंभ हुआ, जिसने भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और आधुनिक वैज्ञानिक विमर्श के सुंदर समन्वय को दर्शाया। देश-विदेश के विद्वानों की उपस्थिति ने इस संगोष्ठी को वास्तव में अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। उज्बेकिस्तान से प्रोफेसर ओलीम रूजीमुरादेव का आभासी बीज वक्तव्य विशेष रूप से विचारोत्तेजक रहा। उन्होंने ग्रीनहाउस प्रभाव के परिणामस्वरूप उत्पन्न जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को वैज्ञानिक तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया। मुख्य अतिथि प्रोफेसर राणा प्रताप सिंह, कुलपति, गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय, ने ज...

लेखनी का दायित्व

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लेखनी का दायित्व मनुष्य के पास अनेक साधन हैं, परंतु विचारों को स्थायित्व देने वाला सबसे प्रभावी साधन लेखनी है। वाणी क्षणिक हो सकती है, पर लेखनी समय की सीमाओं को पार कर पीढ़ियों तक संवाद करती रहती है। जब कोई लेखक अपनी कलम उठाता है, तो वह केवल शब्द नहीं लिखता, बल्कि समाज की चेतना, संवेदना और दिशा का निर्माण करता है। यही कारण है कि लेखनी को सदैव उत्तरदायित्व का प्रतीक माना गया है। लेखनी का दायित्व केवल अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जागरण का माध्यम भी है। एक सशक्त लेख समाज में विचारों की क्रांति ला सकता है, जन-जन के मन में नई चेतना जगा सकता है और जड़ता को तोड़ सकता है। कई बार जो कार्य शस्त्र नहीं कर पाते, वह शास्त्र और विचार कर दिखाते हैं। इतिहास साक्षी है कि महान साहित्यकारों, कवियों और चिंतकों ने अपनी लेखनी से समाज को नई दिशा प्रदान की है। वास्तव में, लेखनी मन परिवर्तन की सबसे प्रभावी शक्ति है। जो बात हम केवल शब्दों से समझा नहीं पाते, उसे संवेदनशील लेखन हृदय तक पहुँचा देता है। एक देशभक्ति से ओत-प्रोत रचना राष्ट्रभाव को जागृत करती है, तो ऐतिहासिक विषयों पर आधारित साहित्य हमें अपने...

भ्रमों के मध्य विवेक की राह

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भ्रमों के मध्य विवेक की राह  नागरिक कैसे समझें क्या सही है? आज का सामाजिक परिदृश्य एक विचित्र द्वंद्व से भरा हुआ है। हर व्यक्ति, हर समूह और हर मंच अपने पक्ष को विवेकसम्मत सिद्ध करने में लगा है—चाहे वह वास्तव में विवेकसम्मत हो या नहीं। परिणामस्वरूप समाज में विचारों की विविधता तो बढ़ी है, पर स्पष्टता कम होती जा रही है। ऐसे में सामान्य नागरिक का मन स्वाभाविक रूप से प्रश्नों से भर उठता है—आख़िर हम समझें कैसे और क्या? राजीव और राकेश की स्थिति वस्तुतः आज के जागरूक नागरिक की स्थिति का प्रतीक है। एक मंच पर “जाति सर्वोपरि” का कथन और दूसरे मंच पर “राष्ट्र सर्वोपरि” का उद्घोष—दोनों ही अपने-अपने संदर्भों में प्रभावी प्रतीत होते हैं, परंतु श्रोता के मन में एक गहरा द्वंद्व उत्पन्न कर देते हैं। जब विचार मंच बदलते हैं और मूल्य भी बदलते दिखते हैं, तब विवेक असमंजस में पड़ना स्वाभाविक है। कथनों का आकर्षण और सत्य का परीक्षण समाज में दिए जाने वाले अधिकांश भाषण भावनाओं को स्पर्श करते हैं, तर्क को नहीं। जब कोई वक्ता जाति, धर्म, राष्ट्र, भाषा या किसी भी पहचान को सर्वोपरि बताता है, तो वह श्रोताओं की सामूहि...

ज़रूरी क्या? (भूमिका सहित)

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भूमिका आज का समय सूचनाओं, दृश्यों और विकल्पों की प्रचुरता का समय है। हर क्षण हमारे सामने जानने, देखने और चुनने के अनगिनत मार्ग खुले रहते हैं। परंतु इसी बहुलता के बीच विवेक का संकट भी उतना ही गहरा हो गया है—क्या जानना उचित है, क्या अनदेखा करना आवश्यक है, और किन राहों पर चलना सार्थक है, इसका निर्णय सरल नहीं रह गया। मनुष्य का मन आकर्षणों से घिरा रहता है, जहाँ आवश्यक से अधिक अनावश्यक का विस्तार दिखाई देता है। प्रस्तुत पंक्तियाँ इसी सूक्ष्म जीवन-दर्शन को सरल शब्दों में उजागर करती हैं। ये हमें सजग करती हैं कि जीवन में सार्थकता का मार्ग सदैव सीमित होता है, जबकि भ्रम, प्रलोभन और विचलन के मार्ग असंख्य होते हैं। इसलिए चयन ही चरित्र का निर्माण करता है—क्या ग्रहण करना है, क्या त्यागना है, और किस दिशा में आगे बढ़ना है। यह प्रस्तावना पाठक को आत्मचिंतन की उस भूमि पर ले जाने का प्रयास है, जहाँ वह बाहरी भीड़ से हटकर अपने भीतर के विवेक को सुन सके और कम किन्तु सही विकल्पों की ओर उन्मुख हो सके। ज़रूरी क्या? जिनको जानना चाहिए आपको,  ऐसी बातें हैं बहुत कम।  जिनको नहीं जानना चाहिए आपको,  ऐसी बा...

समझ से सब कुछ कर देना और कर लेना संभव

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  समझ से सब कुछ कर देना और कर लेना संभव चित्र में दिखता यह ऐंठा और उलझा हुआ वृक्ष आज के जीवन की वास्तविकता का प्रतीक है—जटिलताएँ, सूचनाओं की अधिकता, समय का अभाव और लक्ष्य तक पहुँचने की कठिनाई। फलों का वृक्ष पर होना इस बात का संकेत है कि अवसर, ज्ञान, संसाधन और संभावनाएँ सब हमारे आसपास उपलब्ध हैं, परन्तु उलझी शाखाओं के कारण उन तक सीधी पहुँच सहज नहीं रह जाती। यहीं पर सोशल मीडिया आधारित विभिन्न सॉफ्टवेयर्स की उपयोगिता अत्यंत सहायक रूप में सामने आती है। ये सॉफ्टवेयर्स मानो उस उलझे वृक्ष की शाखाओं के बीच बने मार्ग हैं, जो हमें सीधे फलों तक पहुँचने की समझ देते हैं। उदाहरणतः – सूचना साझा करने वाले प्लेटफ़ॉर्म हमें सही दिशा में ज्ञान प्रदान करते हैं। – कंटेंट निर्माण और संपादन सॉफ्टवेयर विचारों को प्रभावी रूप में अभिव्यक्त करने में सहायक होते हैं। – संवाद आधारित ऐप्स सहयोग, परामर्श और त्वरित समाधान उपलब्ध कराते हैं। – विश्लेषणात्मक टूल्स हमें यह समझने में मदद करते हैं कि कौन-सा प्रयास सार्थक फल दे सकता है। जब हम इन सॉफ्टवेयर्स की कार्यप्रणाली को समझ लेते हैं, तब प्रयास अंधाधुंध नहीं रहते, ब...

दोष-दृष्टि से आत्म-दृष्टि की ओर

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  दोष-दृष्टि से आत्म-दृष्टि की ओर आचार्य निखिल जब यह कहते हैं— “यह एक विचित्र स्थिति लेकिन तथ्यपरक सत्य है कि कमियाँ होती तो सब में हैं; लेकिन नज़र सिर्फ दूसरों में आतीं हैं।”  तो यह कथन केवल सामाजिक व्यवहार का अवलोकन नहीं, बल्कि मनुष्य के मनोविज्ञान और आत्मचेतना का गहन निष्कर्ष है। उस क्षण उनकी मनःस्थिति एक ऐसे सजग द्रष्टा की रही होगी, जो मनुष्य की प्रवृत्ति को भीतर से समझ रहा है। वे देख रहे होंगे कि मनुष्य स्वयं को निर्दोष मानने की सहज आदत रखता है और अपने दोषों को तर्कों के पर्दे में छिपा लेता है, जबकि दूसरों की छोटी-सी त्रुटि भी उसे स्पष्ट दिखाई देती है। यह स्थिति उन्हें विचित्र इसलिए लगी होगी क्योंकि सत्य सबके सामने होते हुए भी मन उसे स्वीकारने से कतराता है। गुरु जी के अंतर्मन में करुणा और आत्मजागरण का भाव रहा होगा। वे यह अनुभव कर रहे होंगे कि जब तक व्यक्ति अपनी कमियों को पहचानने का साहस नहीं करता, तब तक उसका आत्म-विकास संभव ही नहीं है। वे यह भी संकेत कर रहे होंगे कि दोष देखना गलत नहीं, परंतु केवल दूसरों में दोष देखना आत्म-अज्ञान का संकेत है। जिस दृष्टि से हम संसार को देखत...

आइए! ज़रा भावों को समझते हैं!

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आइए! ज़रा भावों को            समझते हैं! जीवन कुछ ऐसा ही हो चुका है आज ऐंठा और उलझा हुआ तो इसके फलों को चुनने और चखने के लिए फलों तक पहुंचना दुष्कर हो गया है तो आसान भी कि हमको ऐसे प्रयासों को केवल समझना भर है फिर इनको चुनना और चखना आसान हो सकता है। भूमिका   मानवीय अंतर्संबंध केवल शब्दों, औपचारिकताओं या सामाजिक परिभाषाओं से संचालित नहीं होते, अपितु वे उन सूक्ष्म और अक्सर अव्यक्त भावों की भूमि पर विकसित होते हैं जो हृदय में स्थान, स्वीकार्यता और संवाद की क्षमता से पोषित होते हैं। जब मन की गुंजाइश संकुचित होने लगती है, तब संबंध बाहरी रूप से बने रहने के बावजूद भीतर से ठहराव की स्थिति में पहुँच जाते हैं—न वे पूर्णतः टूटते हैं, न ही स्वाभाविक रूप से जुड़ पाते हैं। यही वह भावनात्मक द्वंद्व है जहाँ निकटता का आभास और दूरी का अनुभव साथ-साथ उपस्थित रहते हैं। अंतर्संबंधों की इस जटिलता को समझना इसलिए आवश्यक है क्योंकि अव्यक्त भाव, अनकहे प्रश्न और मौन अपेक्षाएँ ही अक्सर रिश्तों को उलझन में डाल देती हैं। अतः इस विमर्श का उद्देश्य किसी निराशावादी निष्कर्ष को स्थापित ...