"क्या है साहित्य " - डॉ. दक्षा जोशी 'निर्झरा'
"क्या है साहित्य " साहित्य क्या है? 'हितेन सहितेन इति साहित्यम्' अर्थात्, जिसमें सबका 'हित' समाहित हो, वही 'साहित्य' है। साहित्य का अर्थ केवल पुस्तकों के पन्ने नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदनाओं का वाणी में रूपांतरण है। साहित्य समाज का दर्पण है और जीवन का मार्गदर्शक प्रकाश-स्तंभ (Light House) है। साहित्य और समाज एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। समाज में जो घटनाएँ घटित होतीं हैं, वे साहित्य में प्रतिबिंबित होती हैं और साहित्य के माध्यम से समाज में वांछित परिवर्तन लाया जा सकता है। इसीलिए कहा गया है कि क़लम की धार बरछी (भाले) की धार से भी अधिक पैनी होती है। भारत का स्वतंत्रता संग्राम और रूस की क्रांति इसके सटीक उदाहरण हैं। टैगोर की पंक्तियाँ हैं— 'जहाँ चित्त भयमुक्त हो' (Where the mind is without fear)। यह हमें सिखाती हैं कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह हमें आंतरिक रूप से मज़बूत बनाता है। साहित्य पढ़ने वाला व्यक्ति कभी अकेला नहीं होता। वह पात्रों के माध्यम से विश्व के हर कोने के मानव की वेदना और संवेदना को समझ सकता है। यही 'सहानुभूत...