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Showing posts from November, 2025

श्री प्रवेंद्र दहिया का निर्णय

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भूमिका   यह आह्वान-पत्र उस सरल लेकिन गहन सत्य से प्रेरित है, जिसे एक प्रधानाचार्य—श्री प्रवेंद्र दहिया—ने नेशनल नेचुरोपैथी डे-2025 के अवसर पर अपने मंथन के रूप में महसूस किया। एक शिक्षा-पुरुष होने के नाते उन्होंने समझा कि स्वास्थ्य केवल दवाओं पर आधारित प्रणाली नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्य की जीवन-पद्धति है। जब उन्होंने अपने विद्यार्थियों को प्राकृतिक चिकित्सालय ले जाने का निर्णय लिया, तो यह संदेश स्पष्ट हुआ कि यदि एक शिक्षक, एक प्रबुद्ध नागरिक, इतनी सहजता से प्राकृतिक चिकित्सा का महत्व समझ सकता है, तो सामान्य जन भी इस मार्ग को अपना सकते हैं। इसी विचार को जन-जागृति का स्वर देने, और प्रकृति-आधारित स्वास्थ्य को समाज की सहज धारा बनाने के उद्देश्य से यह आह्वान जनचेतना मिशन की ओर से प्रस्तुत किया गया है। श्री प्रवेंद्र दहिया का मंथन (निमंत्रण प्राप्त होने के बाद) जब 8वें नेशनल नेचुरोपैथी डे के आयोजन हेतु निमंत्रण प्राप्त हुआ, तो श्री प्रवेंद्र दहिया के मन में एक स्वाभाविक प्रश्न उठा—क्या आज के बच्चों को प्राकृतिक चिकित्सा जैसी प्राचीन किंतु अत्यंत उपयोगी पद्धति के बारे में पर्याप्त...

उलझनों के पार उम्मीद की रोशनी

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भूमिका जब जीवन में अंधेरा घना हो, रात बहुत काली लगे और मन किंकर्तव्यविमूढ़ हो उठे, तब बस एक हल्की-सी किरण ही पर्याप्त होती है—जो उस घने अंधकार को चीर कर राह दिखा सके। मैं आशा गुप्ता—नाट्य कलाकार, लेखिका, कवयित्री, समाजसेविका और सबसे पहले एक संवेदनशील इंसान—अपनी उसी यात्रा को साझा कर रही हूँ, जिसमें दुख-सुख, तनाव-अवसाद सबने साथ निभाया। सफलता की ऊँचाइयों को छूने के बाद भी एक समय ऐसा आया जब सबकुछ धुंधला पड़ने लगा, जैसे मेरा अस्तित्व ही खो गया हो। अवसाद ने मन को इतना जकड़ लिया कि जो हमेशा दूसरों को राह दिखाती रही, वही खुद राह भूल बैठी। पर धीरे-धीरे समझ आया कि इससे बाहर आने के लिए संयम और आत्म-स्वीकृति सबसे जरूरी है। व्यायाम से शरीर को मजबूती मिली, अपने लोगों के बीच रहने से मन का अकेलापन कम हुआ, और सबसे महत्वपूर्ण—मैंने स्वयं को माफ करना सीखा। लिखना मेरे लिए थेरेपी बन गया; कागज़ पर उतरे शब्द मन की गांठें खोलते चले गए। समय लगा, पर विचार बदले, लक्ष्य तय किए और हर दिन खुद को एक कदम आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। आज, आकाशवाणी श्रीविजयपुरम (पोर्ट ब्लेयर) से मेरे धारावाहिक में नई सोच, नये सपने क...

बैंकाक में विश्व पर्यावरण सम्मेलन

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भूमिका विश्व भर में जलवायु परिवर्तन की चिंताएँ लगातार बढ़ती जा रही हैं, और इस संकट का सबसे गहरा असर समुद्री द्वीप-राष्ट्रों पर दिखाई देता है। बैंकाक में आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन इसी वैश्विक चुनौती पर गहन संवाद का मंच बना, जहाँ मालदीव के मछली पालन और महासागरीय संसाधन मंत्री डॉ. अमज़द अहमद ने जलवायु परिवर्तन से जूझ रहे छोटे देशों की वास्तविक स्थिति को स्पष्ट और संवेदनशील रूप से सामने रखा पॉजिटिव डायलॉग की वार्ताकार डॉ रीना वर्मा के साथ वार्ता में। यह वार्ता केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह समुद्र से जुड़े जीवन, आजीविका, पर्यटन, शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के आयामों को भी समझने का एक अवसर बनी। प्रस्तुत लेख इसी संवाद का सरल, सहज और विचारोत्तेजक रूपांतरण है, जो हर वर्ग के पाठक को विषय की गंभीरता और समाधान के मार्ग दोनों से अवगत कराता है। बैंकाक में विश्व पर्यावरण सम्मेलन  मालदीव के मंत्री संग सार्थक बातचीत बैंकाक में आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं था, बल्कि यह धरती के सामने खड़ी गंभीर चुनौतियों पर खुली और स्पष्ट बातचीत का मंच भी बना। इस सम्मेलन ...

प्रधानाचार्य श्री प्रवेंद्र दहिया का आत्मकथ्य

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भूमिका यह हुनर ‘द टैलेंट शो’ एवं विज्ञान प्रदर्शनी केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रधानाचार्य श्री प्रवेंद्र दहिया की दूरदर्शी शैक्षिक सोच का प्रत्यक्ष विस्तार है—जहाँ प्रतिभा को मंच मिलता है, विज्ञान को जीवन मिलता है और बच्चों को अपने भीतर छिपी सम्भावनाओं को पहचानने का अवसर। इस आयोजन के पीछे उनकी यह धारणा सदैव सक्रिय रही कि शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रहकर अनुभव, प्रयोग, अभिव्यक्ति और नवाचार के समन्वय से ही पूर्ण होती है। यही कारण है कि इस संकलित आत्मकथ्य में उनकी दृष्टि, उनकी प्रेरणा और उनकी उस सतत यात्रा की झलक मिलती है, जो हर विद्यार्थी को ‘सीखने’ से आगे ‘सृजन करने’ की ओर अग्रसर करती है। प्रधानाचार्य श्री प्रवेंद्र दहिया का आत्मकथ्य हुनर ‘द टैलेंट शो’ एवं विज्ञान प्रदर्शनी एक दूरदर्शी आयोजन के पीछे मेरी सोच “विद्यालय केवल भवनों का समूह नहीं होता, वह आने वाले भारत की प्रयोगशाला होता है”— इसी विचार के साथ जब मैंने ‘हुनर—द टैलेंट शो’ और विज्ञान प्रदर्शनी का खाका अपने मन में तैयार किया, तो मेरे सामने केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि हमारे विद्यार्थियों का भविष्य चमकता हुआ खड़ा था। म...

प्रधानाचार्य श्री संजीव कुमार नागर का प्रेरक आत्मकथ्य

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भूमिका यह बाल दिवस का अवसर केवल उत्सव भर नहीं, बल्कि उन मासूम आँखों में सजे सपनों के प्रति हमारी सामूहिक प्रतिबद्धता का स्मरण भी है। किसी भी विद्यालय के लिए उसके विद्यार्थी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत और भविष्य की सबसे सशक्त आशा होते हैं। उनके विकास, सुरक्षा, आनंद और सीखने के वातावरण को संवारने में प्रधानाचार्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। अतः बाल दिवस के इस प्रेरणादायी प्रसंग पर प्रस्तुत प्रधानाचार्य श्री संजीव कुमार नागर का आत्मकथ्य न केवल विद्यार्थियों के प्रति उनके स्नेह, समर्पण और मार्गदर्शन का प्रतीक है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि वे हर बच्चे में उज्ज्वल भविष्य की ज्योति जलती हुई देखते हैं। यह भूमिका पाठकों को एक संवेदनशील, प्रेरक और मानवीय दृष्टिकोण से जोड़ते हुए आत्मकथ्य पढ़ने की उत्सुकता को और बढ़ाती है। प्रधानाचार्य श्री संजीव कुमार नागर का प्रेरक आत्मकथ्य (राष्ट्रीय इंटर कॉलेज, नूरनगर) “ 14 नवंबर मेरे लिए केवल एक तिथि नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, सादगी और भविष्य-निर्माण की गहरी प्रेरणा का दिवस है। जब मैं पं. जवाहरलाल नेहरू जी के चित्र पर श्रद्धासुमन अर्पित करता हूँ, तो मुझे उ...

ज्योति जी का यात्रा-वृत्तांत

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भूमिका यात्रा-वृत्तांत केवल स्थानों का विवरण नहीं होते, वे मनुष्य के भीतर छिपे अनुभवों, संवेदनाओं और खोज की उस अनदेखी धारा को शब्द देते हैं जो अक्सर दैनिक जीवन की भीड़ में खो जाती है। एक छोटी-सी यात्रा भी जब मन में उतरकर कलम तक पहुँचती है, तो वह सीमाओं से परे एक नई दुनिया रच देती है—जहाँ लेखक और पाठक दोनों साथ-साथ चलते हैं, महसूस करते हैं, सीखते हैं। यही कारण है कि यात्रा-वृत्तांत लेखन की असीमितता का परिचय कराते हैं; इनमें हर मोड़, हर व्यक्ति, हर स्वाद और हर आकस्मिक घटना एक नए विचार की चिंगारी बन जाती है। इस यात्रा-वृत्तांत की शुरुआत ही पाठक के भीतर वही हलचल जगाने के लिए है—कि वह स्वयं भी अपनी यात्राओं को शब्दों में ढाले, अनुभवों को सहेजे, और दुनिया को अपनी नज़र से देखने का साहस करे। थाईलैंड इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में सहभागिता (एक अविस्मरणीय अनुभव) विद्यार्थियो, गाँवों और परिवर्तन की चेतना से जुड़े ग्राम पाठशाला  अभियान पर शोधपत्र तैयार करना मेरे लिए केवल एक शैक्षणिक कार्य नहीं था, बल्कि यह एक भावनात्मक यात्रा थी। पर यह यात्रा तब और भी ऐतिहासिक बन गई जब यह शोधपत्र थाईलैंड, बैंकॉक मे...