दोष-दृष्टि से आत्म-दृष्टि की ओर

 दोष-दृष्टि से आत्म-दृष्टि की ओर

आचार्य निखिल जब यह कहते हैं—

“यह एक विचित्र स्थिति लेकिन तथ्यपरक सत्य है कि कमियाँ होती तो सब में हैं; लेकिन नज़र सिर्फ दूसरों में आतीं हैं।” 

तो यह कथन केवल सामाजिक व्यवहार का अवलोकन नहीं, बल्कि मनुष्य के मनोविज्ञान और आत्मचेतना का गहन निष्कर्ष है। उस क्षण उनकी मनःस्थिति एक ऐसे सजग द्रष्टा की रही होगी, जो मनुष्य की प्रवृत्ति को भीतर से समझ रहा है। वे देख रहे होंगे कि मनुष्य स्वयं को निर्दोष मानने की सहज आदत रखता है और अपने दोषों को तर्कों के पर्दे में छिपा लेता है, जबकि दूसरों की छोटी-सी त्रुटि भी उसे स्पष्ट दिखाई देती है। यह स्थिति उन्हें विचित्र इसलिए लगी होगी क्योंकि सत्य सबके सामने होते हुए भी मन उसे स्वीकारने से कतराता है।

गुरु जी के अंतर्मन में करुणा और आत्मजागरण का भाव रहा होगा। वे यह अनुभव कर रहे होंगे कि जब तक व्यक्ति अपनी कमियों को पहचानने का साहस नहीं करता, तब तक उसका आत्म-विकास संभव ही नहीं है। वे यह भी संकेत कर रहे होंगे कि दोष देखना गलत नहीं, परंतु केवल दूसरों में दोष देखना आत्म-अज्ञान का संकेत है। जिस दृष्टि से हम संसार को देखते हैं, वही दृष्टि हमारे भीतर की स्थिति को भी प्रकट करती है।

वे शांत स्वर में समझाते हैं कि मनुष्य का अहंकार एक अदृश्य दर्पण की तरह होता है। यह दर्पण दूसरों की छवि तो साफ दिखाता है, पर अपनी धूल को छिपा लेता है। इसलिए व्यक्ति दूसरों की त्रुटियों पर तुरंत प्रतिक्रिया देता है, पर स्वयं की कमियों पर मौन साध लेता है। आचार्य निखिल की उस समय की मनःस्थिति में यह पीड़ा भी रही होगी कि लोग सुधार की बात तो करते हैं, पर सुधार का प्रारम्भ स्वयं से नहीं करना चाहते।

एक दृष्टांत के माध्यम से गुरु जी कहते हैं कि एक शिष्य प्रतिदिन अपने साथियों की शिकायत लेकर गुरु के पास आता था—“वह क्रोधी है, वह आलसी है, वह असभ्य है।” एक दिन गुरु ने उसे एक दर्पण दिया और कहा, “पहले इसमें देखो, फिर दूसरों की बात करो।” शिष्य ने दर्पण में देखा तो पाया कि उसके चेहरे पर भी वही भाव झलक रहे थे, जिनकी शिकायत वह दूसरों में कर रहा था। गुरु ने मुस्कुराकर कहा, “जिस दोष को तुम बाहर पहचान लेते हो, वह भीतर कहीं न कहीं उपस्थित अवश्य होता है।” तब शिष्य को समझ आया कि उसकी दृष्टि वास्तव में आत्म-दृष्टि से रिक्त थी।

फिर गुरु जी एक और उदाहरण देते हैं कि दो व्यक्ति एक ही मार्ग पर चल रहे थे। मार्ग में कीचड़ भी था और फूल भी। पहला व्यक्ति बार-बार कहता रहा कि रास्ता कितना गंदा है, जबकि दूसरा व्यक्ति उसी मार्ग पर चलते हुए फूलों की सुगंध का अनुभव करता रहा। गुरु जी समझाते हैं कि मार्ग दोनों के लिए समान था, पर दृष्टि भिन्न थी। जो व्यक्ति दोष देखने का अभ्यस्त होता है, उसे हर जगह कमी दिखाई देती है; और जो आत्मसुधार की दृष्टि रखता है, वह पहले स्वयं को परिष्कृत करता है।

आचार्य निखिल का यह कथन उस गहन अनुभूति से उपजा प्रतीत होता है कि संसार का वास्तविक सुधार बाहरी आलोचना से नहीं, बल्कि आंतरिक निरीक्षण से होता है। उनकी मनःस्थिति में एक सजग चेतावनी भी निहित थी—यदि हम केवल दूसरों की कमियाँ गिनते रहेंगे, तो स्वयं के दोष स्थायी बन जाएंगे; पर यदि हम अपनी कमियों को पहचानना प्रारम्भ कर दें, तो दूसरों के प्रति दृष्टि स्वतः सहानुभूतिपूर्ण हो जाएगी।

अंततः वे यही आत्मिक संदेश देना चाहते हैं कि कमियाँ होना मानव स्वभाव है, पर उन्हें स्वीकारना साधक का गुण है। जब दृष्टि दोषारोपण से हटकर आत्मनिरीक्षण की ओर मुड़ती है, तब मन में विनम्रता जन्म लेती है, संबंधों में मधुरता आती है और व्यक्तित्व में वास्तविक परिष्कार होता है। इसलिए दोष-दृष्टि से ऊपर उठकर आत्म-दृष्टि को जागृत करना ही आत्मिक उन्नति का प्रथम और अनिवार्य चरण है।

वक्ता


पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 






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