Posts

Showing posts from July, 2025

तकनीकी सुविधा या भ्रम

Image
भूमिका तकनीकी आश्रितता कितनी सही ठहराई जा सकती है जब भी कोई ऐसी घटना घटती है। ऐसे में अपने आश्रितता संबंधी निर्णय की समीक्षा करना आवश्यक हो जाता है।  तकनीक सुविधा या भ्रम  कहाँ ले जा रही है हमें कृत्रिम बुद्धिमता "गूगल ने फिर दिखाया गलत रास्ता, खाड़ी में गिरी कार"   यह समाचार महज एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक गहरी चेतावनी है। यह एक संकेत है उस अति-निर्भरता का, जो हमने आधुनिक तकनीक, विशेषकर एआई आधारित तकनीकों, पर विकसित कर ली है। जीवन को सरल और सुविधाजनक बनाने के लिए जिन साधनों का आविष्कार किया गया, अब वही साधन कई बार हमारी जिंदगियों को उलझा और खतरे में डाल रहे हैं। सहजता की चाह में जटिलता की राह जब गूगल मैप जैसी तकनीकों का विकास हुआ, तो उद्देश्य साफ था — रास्ता दिखाना, समय बचाना, यात्रा को आसान बनाना। लेकिन आज हम ऐसे मोड़ पर हैं, जहाँ आँखें सड़क पर नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर गड़ी होती हैं। बेलापुर की घटना में महिला ने पुल का रास्ता छोड़ सीधे खाड़ी की ओर गाड़ी मोड़ दी — क्योंकि गूगल ने यही रास्ता बताया। यह घटना बताती है कि हम सोचने और परखने की शक्ति को तकनीक के हवाले ...

जीवन साथी - माया शर्मा

Image
जीवन साथी    परिपूर्णता नहीं, अपनत्व की परिभाषा समाज में जब दो लोग जीवन साथी बनते हैं, तो अक्सर यह अपेक्षा की जाती है कि वे 'परफेक्ट कपल' हों — रूप, शिक्षा, सामाजिक स्थिति और शारीरिक स्वस्थता के मानकों पर खरे उतरते हुए। ऐसे जोड़ों को देखकर समाज वाहवाही करता है, उनकी जोड़ी की मिसालें दी जाती हैं। लेकिन जब कोई व्यक्ति किसी ऐसे जीवन साथी को चुनता है जो किसी शारीरिक अंग से विहीन हो या किसी विशेष आवश्यकता वाला हो, तो उसी समाज की नजरें सवालों और तानों से भर जाती हैं। “उसने ऐसा जीवन साथी क्यों चुना?” “क्या उसे किसी लालच ने ऐसा करने पर मजबूर किया?” “जरूर उस इंसान में भी कोई कमी रही होगी।” ऐसे सवाल और शंकाएं समाज में सहज रूप से उठती हैं, जो न केवल पीड़ित व्यक्ति का मनोबल तोड़ती हैं, बल्कि उस साहसी व्यक्ति की भावना और समर्पण को भी ठेस पहुँचाती हैं जिसने सच्चे प्रेम, अपनत्व और समझदारी से अपने जीवन साथी का चुनाव किया। सच्चा जीवन साथी   सहानुभूति नहीं, समानुभूति जो लोग किसी अंगविहीन या दिव्यांग व्यक्ति के साथ जीवन बिताने का निर्णय लेते हैं, वे सहानुभूति नहीं, बल्कि समानुभूति (Empathy)...

बस राम राम ही हो सकी

Image
भूमिका यह एक ऐसे अवसर का विवरण है जब समाज सेवा के लिए एक संकल्पित विभूति शुभ चिंतन के लिए प्रस्तावित लोगों का सहभाग कराने के लिए प्रयासरत है और वह प्रयास इस सहभाग के अत्यावश्यक व्यक्ति के मिल जाने पर पूरा होता प्रतीत होता है, लेकिन एक अन्य आवश्यक की उपलब्धता ना होने पर बस राम-राम ही तक सीमित रह गई। ऐसे में स्तुति है तो प्रयासों की।  "बस राम-राम ही हो सकी..."  यह वाक्य उस क्षण को सहजता से अभिव्यक्त करता है जब दो सज्जन, अशोक जी और प्रशांत जी, एक शुभ चिंतन की ओर अग्रसर होने का प्रयास कर रहे थे। अशोक जी, जो स्वयं एक गंभीर और समाजोन्मुख चिंतक हैं, प्रशांत जी से शिष्टाचार भेंट हेतु पधारे थे। इस भेंट का उद्देश्य केवल औपचारिक अभिवादन नहीं था, बल्कि इसे एक सार्थक सहभाग (Collaborative Dialogue) में परिवर्तित करने की कल्पना भी उनके मन में थी। इस सहभाग का विचार और भी प्रभावी होता यदि 'उलझन सुलझन' मासिक पत्रिका से संबद्ध एक अन्य सज्जन की उपस्थिति भी संभव हो पाती।         कृत्रिम बुद्धिमता से वस्तुस्थिति का चित्रण सिर्फ समझने भर के लिए प्रशांत जी मुख्य द्वार पर उपस्थित थ...

“यह तो बस शुरुआत है, लड़कियो! … मंज़िलें अभी और भी हैं!”

Image
“यह तो बस शुरुआत है, लड़कियो! मंज़िलें अभी और भी हैं!” एक भावनात्मक संदेश श्रीमती नीतू श्यामदेव भड़ाना की ओर से 'एंपावर्ड गुजरिया' की तरफ से प्यारी बहनो और बेटियो!  'हरियाली तीज – शिव-गौरा विवाह रीलोडेड' केवल एक कार्यक्रम नहीं था। यह हमारी परंपरा की जड़ों से जुड़ने और आत्मबल की शाखाओं से ऊँचाइयों को छूने का एक साझा प्रयास था। इस आयोजन में आप सभी की भागीदारी, उत्साह और समर्पण ने जो माहौल रचा, वह शब्दों से नहीं भावनाओं से व्यक्त किया जा सकता है। जब हमने यह तय किया कि हम तीज को कुछ अलग ढंग से मनाएंगे — केवल श्रृंगार और गीतों तक सीमित न रखकर उसमें संस्कार, सशक्तिकरण और समरसता का रंग भी घोलेंगे, तब यह बात स्पष्ट थी कि यह एक नई शुरुआत होगी। और अब जब यह आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ है, तो मैं पूरे दिल से कहती हूँ — “यह तो बस शुरुआत है, लड़कियो! … मंज़िलें अभी और भी हैं!” क्योंकि हमारा लक्ष्य केवल एक पर्व मनाना नहीं है, हमारा सपना है हर लड़की को खुद पर गर्व करना सिखाना, हर महिला को यह यकीन दिलाना कि वह केवल एक गृहिणी, बहन या बेटी नहीं, बल्कि परंपरा की संरक्षक, समाज की निर्माता ...

तीज उत्सव 2025

Image
  तीज उत्सव 2025  समृद्ध संस्कृति की जीवंत झलक – एक भावनात्मक वृत्तांत संगठन गुर्जर समाज कल्याण            परिषद्, पंचकूला के महासचिव इंजीनियर राजवीर सिंह         'राज' की कलम से।) समाज के समर्पित साथियो!  आज मैं अत्यंत गर्व और भावविभोरता के साथ गुर्जर समाज कल्याण परिषद्, पंचकूला द्वारा आयोजित तीज उत्सव 2025 की स्मृतियों को शब्दों में पिरोने का प्रयास कर रहा हूँ। दिनांक विशेष था, स्थान था गुर्जर भवन, सेक्टर 10, पंचकूला – जहाँ नारी शक्ति की रंगत, बालकों की मुस्कान और हमारे सांस्कृतिक मूल्यों की गूँज एक साथ गूंज रही थी। दोपहर 12 बजे से सायं 4 बजे तक का यह कार्यक्रम समाज की ऊर्जा, एकता और उत्सवधर्मिता का जीवंत प्रतीक बन गया। लगभग ढाई सौ से अधिक महिलाओं और बच्चों की उपस्थिति ने इस समारोह को सचमुच अविस्मरणीय बना दिया। रंग-बिरंगे परिधानों में सजी महिलाएँ, बच्चों की उत्साही टोलियाँ, झूलों पर हँसी की खनक, और गीत-संगीत की बहार ने गुर्जर भवन को किसी उत्सवधाम में बदल दिया। कार्यक्रम में प्रस्तुत किए गए नृत्य, अंताक्षरी, लोकगीत ...

यूट्यूब वीडियो को भी समझें

Image
भूमिका इस वीडियो में प्रेरणादायक कहानी के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा और करियर निर्माण के लिए आवश्यक बदलावों पर गहन विचार विनिमय है। यह छात्रों, अभिभावकों, और शिक्षकों के लिए महत्वपूर्ण संदेश लेकर आता है कि शिक्षा केवल डिग्री तक सीमित नहीं है, बल्कि स्किल्स और सही मार्गदर्शन के साथ ही जीवन में सफलता संभव है। अंकुर बंसल की कहानी यह प्रमाणित करती है कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, लगन, मेहनत और सही गाइडेंस से हर कोई अपने सपनों को पूरा कर सकता है। वीडियो संदर्भ https://youtu.be/zSRd-hxg7T0?si=UVpabruHpaSQyf-g मुख्य बिंदु  1. पढ़ाई के साथ-साथ व्यावहारिक स्किल्स का होना आज के समय में बेहद आवश्यक है, क्योंकि केवल अच्छे प्रतिशत से नौकरी मिलना मुश्किल हो गया है।   2. 90% छात्र ऐसे हैं जिन्हें अच्छे ग्रेड्स के बावजूद इंटर्नशिप या नौकरी पाने में समस्या होती है क्योंकि उनके पास व्यावहारिक कौशल (skills) नहीं होते।   3. अंकुर बंसल ने 10वीं कक्षा से ही परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए धागे की फैक्ट्री में काम करना शुरू किया और 10 साल तक मेहनत की।   4. उन्होंने बीटेक...

आचरण की शुद्धता – दूसरों से नहीं, स्वयं से अपेक्षा कीजिए

Image
एक प्रेरणादायक व्याख्यान (सरल भाषा में, बच्चों, अभिभावकों और समाज के लिए उपयोगी) नमस्कार सभी सुधी श्रोताओं को, आज हम एक ऐसे विषय पर चर्चा करने जा रहे हैं, जो बहुत साधारण-सा लगता है, लेकिन हमारे जीवन और समाज की जड़ों से जुड़ा हुआ है। यह विषय है — "आचरण की शुद्धता", यानी व्यवहार में शुचिता और सच्चाई। 🌼 एक सामान्य लेकिन जरूरी सवाल क्या आपने कभी सोचा है कि हम अक्सर दूसरों से तो अच्छा आचरण चाहते हैं, लेकिन खुद उस पर चलने की कोशिश नहीं करते? बच्चे गलतियाँ करें तो हम डाँटते हैं, लेकिन खुद जब नियम तोड़ते हैं, तब हमें कोई संकोच नहीं होता। क्यों? 🔍 आइए इस व्यवहार की गहराई में जाएँ: 🔹 1. हम आत्मनिरीक्षण करना नहीं सीखते हम दूसरों की गलती जल्दी पकड़ लेते हैं, लेकिन खुद को देखना मुश्किल लगता है। आसान क्या है – उंगली उठाना या खुद को सुधारना? बच्चे नहीं चाहते कि हम परफेक्ट हों – वे चाहते हैं कि हम सच्चे हों। 🔹 2. हम अपनी आदतों के गुलाम हो जाते हैं हम खुद जिस तरीके से जीने के आदी हैं, उसे बदलना मुश्किल लगता है। लेकिन बच्चों को जब हम आदर्श बातें सिखाते हैं – तो वो हमें देख रहे हो...

प्रचार हेतु समाचार की सूचना

Image
भूमिका मन के सच्चे बालकों की मासूमियत भरे परस्पर तय किये गए एक निर्णय को सामाजिक दृष्टि से प्रचार - प्रसार योग्य मान उसको समाचार पत्र में प्रकाशित किये जाने संबंधी एक शिक्षक का पत्र।  पत्र का मजमून शिक्षक हंसराज हंस महात्मा गांधी विद्यालय, बनेठा ब्लॉक – उनियारा, जिला – टोंक, राजस्थान दिनांक: 07 जुलाई 2025 सेवा में, संवाददाता महोदय/महोदया राजस्थान विषय: विद्यालय के छात्रों द्वारा ईमानदारी का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करने के संदर्भ में!  महोदय, सविनय निवेदन है कि मैं महात्मा गांधी विद्यालय, बनेठा का एक शिक्षक हंसराज हंस, आपके माध्यम से समाज को एक अत्यंत प्रेरणादायक एवं मूल्यपरक घटना से अवगत कराना चाहता हूँ, जिससे बच्चों में नैतिकता एवं सच्चरित्रता को प्रोत्साहन मिले। हाल ही में हमारे विद्यालय के दो छात्र — अभिषेक (कक्षा 7) एवं भगवान (कक्षा 2) — खेल के दौरान विद्यालय परिसर में एक मोबाइल फ़ोन प्राप्त हुआ। आज के युग में जहाँ भौतिक वस्तुएं आकर्षण का केंद्र बन चुकी हैं, वहाँ इन दोनों बालकों ने उस मोबाइल को अपने पिता को सौंप दिया, जिन्होंने आगे उसे विद्यालय में संबंधित शिक्षक को लौटाय...

देश के युवाओं के नाम पत्र

देश के युवाओं के नाम एक पत्र (शिक्षक श्री ब्रह्मपाल सिंह नागर जी एवं उनके गुरु स्वर्गीय श्री सत्यपाल जी की शिक्षाओं को स्मृति में रखकर) प्रिय युवाओ!  आशा है आप सभी स्वस्थ, प्रसन्न और उत्साह से भरपूर होंगे। आज मैं आप सभी से एक महत्वपूर्ण विषय पर बात करना चाहता हूँ—हमारी सोच, हमारे जीवन के मूल्य और हमारे चरित्र की शक्ति को लेकर। यह पत्र एक अद्भुत शिक्षक श्री ब्रह्मपाल सिंह नागर जी को केंद्र में रखकर मैंने लिखा है, जिन्होंने अपने जीवन को समाज की बुराइयों से दूर रखते हुए सदैव सत्य और आदर्शों की राह अपनाई। उन्होंने अपने पूजनीय गुरु स्वर्गीय श्री सत्यपाल जी के मार्गदर्शन में शिक्षा प्राप्त की, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन छात्रों को सामाजिक बुराइयों से बचाने और उनके मन को मजबूत बनाने को तैयार करने में लगा दिया।   आप सब जानते हैं कि आज के युवा ही कल का भविष्य हैं। समाज, संस्कृति और नैतिक मूल्यों की बागडोर आपके हाथों में है। लेकिन वर्तमान समय में जहाँ चारों ओर नकारात्मक प्रभाव, प्रलोभन और बुरी संगत का जाल फैला हुआ है, वहाँ सही राह पर चलना कठिन तो होता जा रहा है लेकिन नामुमकिन नही...