Posts

सफलता यों ही नहीं मिलती, पूरा 'गाँव' बसाना पड़ता है

सफलता यों ही नहीं मिलती, पूरा 'गाँव' बसाना पड़ता है प्रायः सफलता को अक्सर एक व्यक्ति की उपलब्धि के रूप में देख लिया जाता है, लेकिन वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत और कहीं गहन है। सत्य तो यह है कि सफलता यों ही नहीं पनपती—उसके पीछे परिवार, गुरु, मित्र, सहकर्मी और मार्गदर्शकों के रूप में पूरा 'गाँव' खड़ा होता है। किसी छोटे शहर से बड़े सपनों की ओर बढ़ना आसान नहीं। सीमित संसाधन, सीमित अवसर और समाज की तयशुदा अपेक्षाएँ—ये सब राह में आती हैं। लेकिन जब परिवार शिक्षा को महत्व दे और बेटियों को बराबरी का हक दे आत्मविश्वास की जमीन तैयार करे, तब सीमाएँ ही सीढ़ियाँ बन जाती हैं। शिक्षा केवल डिग्री के रूप में प्रमाणपत्र भर नहीं देती, अपितु सोचने की क्षमता देती है—खुद को चुनौती देने की, अपने डर पहचानने की और उनसे आगे निकलने की। बड़े संस्थानों में पढ़ाई और काम करने का अनुभव यह सिखाता है कि पद या ओहदे से अधिक महत्वपूर्ण वह मूल्य है जो आप अपने काम से जोड़ते हैं। असल पहचान तो आपकी सोच, ईमानदारी और योगदान से बनती है। मेंटर्स हैं मौन शक्ति के स्तंभ जीवन के हर मोड़ पर हमें ऐसे लोग मिलते हैं जो आ...

यह साथ आखिर है क्या?

Image
यह साथ आखिर है क्या? भूमिका कुछ रिश्ते शब्दों में नहीं ढलते, वे बस महसूस किए जाते हैं—धीरे-धीरे, अनकहे, अनजाने। वे किसी परिभाषा के मोहताज नहीं होते, क्योंकि उनका अस्तित्व ही अपने आप में एक गूढ़ व्याख्या होता है। विजया डालमिया की यह रचना ऐसे ही एक संबंध की संवेदनात्मक यात्रा है, जहाँ साथ चलने की निरंतरता तो है, पर उस साथ की प्रकृति को लेकर मन में एक गहरा प्रश्न भी है। “ये कहाँ आ गए हम यूँ ही साथ चलते-चलते...” से आरंभ होती यह अभिव्यक्ति केवल दो व्यक्तियों के बीच के संबंध का चित्रण नहीं, बल्कि उस भावभूमि का विस्तार है जहाँ प्रेम, आदत, अपनापन, दूरी और निकटता—सभी एक साथ गुंथे हुए हैं। यहाँ रिश्ते की जटिलता भी है और उसकी सहजता भी; एक-दूसरे के बिना अधूरे होने का एहसास भी है और उस अधूरेपन को स्वीकार करने की परिपक्वता भी। इस रचना में मौन की भी अपनी भाषा है और स्मृतियों की भी अपनी उपस्थिति। शब्द जहाँ ठहर जाते हैं, वहाँ आँसू बोलने लगते हैं, और जहाँ तर्क समाप्त होते हैं, वहाँ विश्वास अपनी जड़ें और गहरी कर लेता है। यह कविता उन सूक्ष्म भावों को उजागर करती है, जो अक्सर हमारे भीतर होते तो हैं, पर अभिव...

डॉ. राकेश राणा का आत्मकथ्य

Image
  डॉ. राकेश राणा का आत्मकथ्य विषय : शहरी महिलाओं में ऑनलाइन शॉपिंग का बढ़ता क्रेज  स्थान : एम.एम.एच. कॉलेज, गाजियाबाद शिक्षा को मैं हमेशा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित एक प्रक्रिया नहीं मानता, बल्कि इसे जीवन के वास्तविक अनुभवों से जुड़ी एक सतत यात्रा के रूप में देखता हूँ। मेरे लिए कक्षा केवल एक प्रारंभिक बिंदु है, जबकि समाज स्वयं एक विस्तृत प्रयोगशाला है, जहाँ हर दिन कुछ नया सीखने और समझने का अवसर मिलता है। हाल ही में शहरी महिलाओं में ऑनलाइन शॉपिंग के बढ़ता क्रेज विषय पर विद्यार्थियों के साथ किया गया फील्ड सर्वेक्षण इसी सोच का परिणाम है। इस विषय के चयन के पीछे यह समझ थी कि आज का समाज तकनीकी परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, और यह परिवर्तन विशेष रूप से महिलाओं के जीवन को नई दिशा दे रहा है। जब मैंने समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष श्रीमती रेखा शर्मा के विचार सुने, तो यह और स्पष्ट हुआ कि ऑनलाइन शॉपिंग केवल एक उपभोक्ता प्रवृत्ति नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली, समय की मांग और तकनीकी सशक्तिकरण का प्रतीक है। इसी समझ को विद्यार्थियों तक पहुँचाने के लिए मैंने उन्हें समूहों में संगठित कर फील्ड में भे...

🌸 सुगंध का आध्यात्मिक सत्य 🌸

Image
 🌸 सुगंध का आध्यात्मिक         सत्य 🌸 जीवन में कुछ तत्व ऐसे होते हैं जो स्वयं को मिटाकर भी अपनी पवित्रता बनाए रखते हैं। पुष्प उनमें सबसे सुंदर उदाहरण है। वह किसी के स्पर्श से अछूता नहीं रहता—मधुमक्खियाँ आती हैं, तितलियाँ मंडराती हैं, हवाएँ उसको स्पर्श करती हैं—फिर भी उसकी पवित्रता, उसकी सुगंध, उसकी निर्मलता कभी कम नहीं होती। यही भाव प्रमिला त्रिवेदी के शब्दों में गहराई से झलकता इस चित्र की मानिंद। पुष्प का जीवन हमें एक अद्भुत आध्यात्मिक शिक्षा देता है। मधुमक्खी जब पुष्प के पास आती है, तो वह उसका मकरंद ले जाती है, पराग कण अपने साथ ले जाती है। देखने में यह ऐसा लगता है जैसे पुष्प से कुछ छीन लिया गया हो, जैसे कोई उसे ठग कर चला गया हो। लेकिन पुष्प इस हानि पर कोई शोक नहीं करता। वह अपनी प्रकृति के अनुरूप बस सुगंध बिखेरता रहता है। यही उसकी साधना है, यही उसका धर्म है। यहाँ एक गहरा संदेश छिपा है— सच्ची पवित्रता बाहरी स्पर्शों से नहीं, बल्कि भीतर की भावना से निर्धारित होती है। जिस प्रकार पुष्प बार-बार छुए जाने पर भी अपनी सुगंध नहीं खोता, उसी प्रकार मनुष्य को भी संसा...

🌷रात्रि चिन्तन और उसका सूक्ष्म विश्लेषण🌷

Image
 🌷रात्रि चिन्तन और उसका         सूक्ष्म विश्लेषण🌷 भूमिका जीवन का यह शांत क्षण हमें एक सच्चाई के सामने खड़ा करता है कि दुनिया हमारी परेशानियों से अधिक हमारे परिणामों को देखती है, इसलिए शिकायतों में उलझे रहने के बजाय कर्म की ओर बढ़ना ही बुद्धिमानी है; जैसे एक विद्यार्थी की मेहनत तभी सार्थक मानी जाती है जब वह परिणाम में झलकती है, उसी प्रकार हमारा प्रयास ही हमारी पहचान बनता है। यह विचार हमें भीतर से झकझोरता है कि कोई चमत्कार हमारी राह आसान करने नहीं आएगा, बल्कि हमें ही अपने संकल्प और श्रम से अपनी राह बनानी होगी। हाँ, थकान के क्षणों में विश्राम आवश्यक है, पर यह विश्राम कहीं आलस्य में न बदल जाए, इसका ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है; इसलिए नकारात्मकता को छोड़कर आने वाले दिन के लिए एक स्पष्ट और सकारात्मक योजना बनाना ही सच्ची तैयारी है। इस चिंतन में यह गूंज भी स्पष्ट है कि सच्ची संपत्ति हमारा स्वास्थ्य है और सबसे बड़ी ताकत हमारा आत्मविश्वास, क्योंकि अंततः जीवन के मैदान में उतरकर अपनी लड़ाई हमें स्वयं ही लड़नी होती है। यही रात्रि का आत्ममंथन अगली सुबह को प्रकाशमान ब...

#ऐसी कोई कहानी लिख#

Image
 #ऐसी कोई कहानी लिख# भूमिका यह कविता केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि एक जागृत चेतना की पुकार है—एक ऐसी संवेदनशील आत्मा की अभिव्यक्ति, जो लेखनी को मात्र अभिव्यक्ति का साधन नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का माध्यम मानती है। कवि बाबू लाल “नायक” जी ने इस रचना के माध्यम से लेखन की उस जिम्मेदारी को रेखांकित किया है, जो केवल भावनाओं तक सीमित न रहकर सत्य, न्याय, प्रेम, सद्भाव और मानवता के व्यापक आयामों को स्पर्श करती है। “ऐसी कोई कहानी लिख” एक प्रेरणात्मक उद्घोष है—जो हर लेखक, विचारक और संवेदनशील व्यक्ति को यह सोचने के लिए विवश करता है कि उसकी लेखनी का उद्देश्य क्या है। क्या वह केवल मनोरंजन का साधन है, या फिर वह समाज में व्याप्त अन्याय, असमानता और संवेदनहीनता के विरुद्ध एक सशक्त स्वर बन सकती है? इस कविता में बार-बार दोहराया गया आग्रह, एक आह्वान है—कि हम लिखें, परंतु ऐसा लिखें जो दिशा दे, जो जागरूक करे, जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का कार्य करे। कवि ने अत्यंत सरल शब्दों में जीवन के गूढ़ तत्वों—धर्म और अधर्म, नीति और अनीति, प्रेम और प्रतिकार, संबंध और शासन—सभी को समेटते हुए लेखन के विविध आयामो...

फ़क्र, फ़िक्र और ज़िक्र

Image
फ़ख्र, फ़िक्र और ज़िक्र हम प्रायः उन लोगों पर फ़क्र करते हैं जो हमारा नाम रोशन करते हैं। किंतु उससे भी अधिक फ़क्र उन पर होता है जो हमारी फ़िक्र करते हैं और उसका ज़िक्र तक नहीं करते। यही रिश्तों की सबसे सच्ची पहचान होती है—जहाँ चिंता है, संवेदना है, लेकिन उसका प्रदर्शन नहीं है। यदि शब्दों को ध्यान से देखें तो फ़क्र और फ़िक्र में केवल एक मात्रा का अंतर है, परंतु फ़िक्र से फ़क्र तक पहुँचने का सफ़र बहुत लंबा और गहरा होता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे दिन का बदलता हुआ रूप—गोधूलि की शांत बेला, फिर गहरी काली रात, और उसके बाद उगते सूर्य की लालिमा से फैलता सुनहरा प्रकाश। महज़ चौबीस घंटों के भीतर प्रकृति के इतने रूप बदल जाते हैं। जीवन भी इसी तरह हमें अनेक अनुभवों और भावनाओं के रंगों से परिचित कराता है। दरअसल, फ़िक्र और फ़क्र आपस में गहराई से जुड़े हुए भाव हैं। जब हम कोई अच्छा कार्य करते हैं, ईमानदारी से अपने दायित्व निभाते हैं या जीवन में कोई उपलब्धि प्राप्त करते हैं, तब हमसे जुड़े लोग हम पर फ़क्र महसूस करते हैं। परंतु याद रखिए—फ़क्र वही करते हैं जिनके मन में हमारे लिए सच्ची फ़िक्र भी होती है। बचपन ...