लेखनी का दायित्व
लेखनी का दायित्व
लेखनी का दायित्व केवल अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जागरण का माध्यम भी है। एक सशक्त लेख समाज में विचारों की क्रांति ला सकता है, जन-जन के मन में नई चेतना जगा सकता है और जड़ता को तोड़ सकता है। कई बार जो कार्य शस्त्र नहीं कर पाते, वह शास्त्र और विचार कर दिखाते हैं। इतिहास साक्षी है कि महान साहित्यकारों, कवियों और चिंतकों ने अपनी लेखनी से समाज को नई दिशा प्रदान की है।
वास्तव में, लेखनी मन परिवर्तन की सबसे प्रभावी शक्ति है। जो बात हम केवल शब्दों से समझा नहीं पाते, उसे संवेदनशील लेखन हृदय तक पहुँचा देता है। एक देशभक्ति से ओत-प्रोत रचना राष्ट्रभाव को जागृत करती है, तो ऐतिहासिक विषयों पर आधारित साहित्य हमें अपने अतीत से जोड़ता है। साहित्य का यही स्वरूप उसे अमर बनाता है। वह कभी पुराना नहीं होता, न ही उसका प्रभाव क्षीण होता है; वह निरंतर नवीन, प्रेरक और प्रासंगिक बना रहता है।
लेखक, कवि, ग़ज़लकार और साहित्यकार समाज के भावनात्मक शिल्पकार होते हैं। उनकी लेखनी केवल मनोरंजन नहीं करती, बल्कि मार्गदर्शन भी करती है। इसलिए लेखनी का प्रयोग सदैव सकारात्मक, मानवीय और लोकहितकारी दृष्टि से होना चाहिए। जब लेखन समाज, राष्ट्र और मानवता के हित में होता है, तब वह केवल साहित्य नहीं, बल्कि एक सामाजिक दायित्व का निर्वहन बन जाता है।
अतः लेखनी का दायित्व है कि वह सत्य, संवेदना और सद्भाव का प्रसार करे। साहित्य नित-नूतन है—“दिनै-दिनै नवम् नवम्”—और यही उसकी जीवंतता है। जितना अधिक हम समाज और देश के लिए सार्थक लेखन करेंगे, उतना ही हमारी लेखनी अपने दायित्व को पूर्ण करेगी। लेखनी को विराम नहीं, दिशा चाहिए; क्योंकि विचारों से ही भविष्य का निर्माण होता है।
सृजक
प्रमिला त्रिवेदी जी
स्थानीय सम्पादिका
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
हैदराबाद
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति






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