Posts

Showing posts from March, 2026

यह साथ आखिर है क्या?

Image
यह साथ आखिर है क्या? भूमिका कुछ रिश्ते शब्दों में नहीं ढलते, वे बस महसूस किए जाते हैं—धीरे-धीरे, अनकहे, अनजाने। वे किसी परिभाषा के मोहताज नहीं होते, क्योंकि उनका अस्तित्व ही अपने आप में एक गूढ़ व्याख्या होता है। विजया डालमिया की यह रचना ऐसे ही एक संबंध की संवेदनात्मक यात्रा है, जहाँ साथ चलने की निरंतरता तो है, पर उस साथ की प्रकृति को लेकर मन में एक गहरा प्रश्न भी है। “ये कहाँ आ गए हम यूँ ही साथ चलते-चलते...” से आरंभ होती यह अभिव्यक्ति केवल दो व्यक्तियों के बीच के संबंध का चित्रण नहीं, बल्कि उस भावभूमि का विस्तार है जहाँ प्रेम, आदत, अपनापन, दूरी और निकटता—सभी एक साथ गुंथे हुए हैं। यहाँ रिश्ते की जटिलता भी है और उसकी सहजता भी; एक-दूसरे के बिना अधूरे होने का एहसास भी है और उस अधूरेपन को स्वीकार करने की परिपक्वता भी। इस रचना में मौन की भी अपनी भाषा है और स्मृतियों की भी अपनी उपस्थिति। शब्द जहाँ ठहर जाते हैं, वहाँ आँसू बोलने लगते हैं, और जहाँ तर्क समाप्त होते हैं, वहाँ विश्वास अपनी जड़ें और गहरी कर लेता है। यह कविता उन सूक्ष्म भावों को उजागर करती है, जो अक्सर हमारे भीतर होते तो हैं, पर अभिव...

डॉ. राकेश राणा का आत्मकथ्य

Image
  डॉ. राकेश राणा का आत्मकथ्य विषय : शहरी महिलाओं में ऑनलाइन शॉपिंग का बढ़ता क्रेज  स्थान : एम.एम.एच. कॉलेज, गाजियाबाद शिक्षा को मैं हमेशा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित एक प्रक्रिया नहीं मानता, बल्कि इसे जीवन के वास्तविक अनुभवों से जुड़ी एक सतत यात्रा के रूप में देखता हूँ। मेरे लिए कक्षा केवल एक प्रारंभिक बिंदु है, जबकि समाज स्वयं एक विस्तृत प्रयोगशाला है, जहाँ हर दिन कुछ नया सीखने और समझने का अवसर मिलता है। हाल ही में शहरी महिलाओं में ऑनलाइन शॉपिंग के बढ़ता क्रेज विषय पर विद्यार्थियों के साथ किया गया फील्ड सर्वेक्षण इसी सोच का परिणाम है। इस विषय के चयन के पीछे यह समझ थी कि आज का समाज तकनीकी परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, और यह परिवर्तन विशेष रूप से महिलाओं के जीवन को नई दिशा दे रहा है। जब मैंने समाजशास्त्र विभागाध्यक्ष श्रीमती रेखा शर्मा के विचार सुने, तो यह और स्पष्ट हुआ कि ऑनलाइन शॉपिंग केवल एक उपभोक्ता प्रवृत्ति नहीं, बल्कि बदलती जीवनशैली, समय की मांग और तकनीकी सशक्तिकरण का प्रतीक है। इसी समझ को विद्यार्थियों तक पहुँचाने के लिए मैंने उन्हें समूहों में संगठित कर फील्ड में भे...

🌸 सुगंध का आध्यात्मिक सत्य 🌸

Image
 🌸 सुगंध का आध्यात्मिक         सत्य 🌸 जीवन में कुछ तत्व ऐसे होते हैं जो स्वयं को मिटाकर भी अपनी पवित्रता बनाए रखते हैं। पुष्प उनमें सबसे सुंदर उदाहरण है। वह किसी के स्पर्श से अछूता नहीं रहता—मधुमक्खियाँ आती हैं, तितलियाँ मंडराती हैं, हवाएँ उसको स्पर्श करती हैं—फिर भी उसकी पवित्रता, उसकी सुगंध, उसकी निर्मलता कभी कम नहीं होती। यही भाव प्रमिला त्रिवेदी के शब्दों में गहराई से झलकता इस चित्र की मानिंद। पुष्प का जीवन हमें एक अद्भुत आध्यात्मिक शिक्षा देता है। मधुमक्खी जब पुष्प के पास आती है, तो वह उसका मकरंद ले जाती है, पराग कण अपने साथ ले जाती है। देखने में यह ऐसा लगता है जैसे पुष्प से कुछ छीन लिया गया हो, जैसे कोई उसे ठग कर चला गया हो। लेकिन पुष्प इस हानि पर कोई शोक नहीं करता। वह अपनी प्रकृति के अनुरूप बस सुगंध बिखेरता रहता है। यही उसकी साधना है, यही उसका धर्म है। यहाँ एक गहरा संदेश छिपा है— सच्ची पवित्रता बाहरी स्पर्शों से नहीं, बल्कि भीतर की भावना से निर्धारित होती है। जिस प्रकार पुष्प बार-बार छुए जाने पर भी अपनी सुगंध नहीं खोता, उसी प्रकार मनुष्य को भी संसा...

🌷रात्रि चिन्तन और उसका सूक्ष्म विश्लेषण🌷

Image
 🌷रात्रि चिन्तन और उसका         सूक्ष्म विश्लेषण🌷 भूमिका जीवन का यह शांत क्षण हमें एक सच्चाई के सामने खड़ा करता है कि दुनिया हमारी परेशानियों से अधिक हमारे परिणामों को देखती है, इसलिए शिकायतों में उलझे रहने के बजाय कर्म की ओर बढ़ना ही बुद्धिमानी है; जैसे एक विद्यार्थी की मेहनत तभी सार्थक मानी जाती है जब वह परिणाम में झलकती है, उसी प्रकार हमारा प्रयास ही हमारी पहचान बनता है। यह विचार हमें भीतर से झकझोरता है कि कोई चमत्कार हमारी राह आसान करने नहीं आएगा, बल्कि हमें ही अपने संकल्प और श्रम से अपनी राह बनानी होगी। हाँ, थकान के क्षणों में विश्राम आवश्यक है, पर यह विश्राम कहीं आलस्य में न बदल जाए, इसका ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है; इसलिए नकारात्मकता को छोड़कर आने वाले दिन के लिए एक स्पष्ट और सकारात्मक योजना बनाना ही सच्ची तैयारी है। इस चिंतन में यह गूंज भी स्पष्ट है कि सच्ची संपत्ति हमारा स्वास्थ्य है और सबसे बड़ी ताकत हमारा आत्मविश्वास, क्योंकि अंततः जीवन के मैदान में उतरकर अपनी लड़ाई हमें स्वयं ही लड़नी होती है। यही रात्रि का आत्ममंथन अगली सुबह को प्रकाशमान ब...

#ऐसी कोई कहानी लिख#

Image
 #ऐसी कोई कहानी लिख# भूमिका यह कविता केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि एक जागृत चेतना की पुकार है—एक ऐसी संवेदनशील आत्मा की अभिव्यक्ति, जो लेखनी को मात्र अभिव्यक्ति का साधन नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का माध्यम मानती है। कवि बाबू लाल “नायक” जी ने इस रचना के माध्यम से लेखन की उस जिम्मेदारी को रेखांकित किया है, जो केवल भावनाओं तक सीमित न रहकर सत्य, न्याय, प्रेम, सद्भाव और मानवता के व्यापक आयामों को स्पर्श करती है। “ऐसी कोई कहानी लिख” एक प्रेरणात्मक उद्घोष है—जो हर लेखक, विचारक और संवेदनशील व्यक्ति को यह सोचने के लिए विवश करता है कि उसकी लेखनी का उद्देश्य क्या है। क्या वह केवल मनोरंजन का साधन है, या फिर वह समाज में व्याप्त अन्याय, असमानता और संवेदनहीनता के विरुद्ध एक सशक्त स्वर बन सकती है? इस कविता में बार-बार दोहराया गया आग्रह, एक आह्वान है—कि हम लिखें, परंतु ऐसा लिखें जो दिशा दे, जो जागरूक करे, जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का कार्य करे। कवि ने अत्यंत सरल शब्दों में जीवन के गूढ़ तत्वों—धर्म और अधर्म, नीति और अनीति, प्रेम और प्रतिकार, संबंध और शासन—सभी को समेटते हुए लेखन के विविध आयामो...

फ़क्र, फ़िक्र और ज़िक्र

Image
फ़ख्र, फ़िक्र और ज़िक्र हम प्रायः उन लोगों पर फ़क्र करते हैं जो हमारा नाम रोशन करते हैं। किंतु उससे भी अधिक फ़क्र उन पर होता है जो हमारी फ़िक्र करते हैं और उसका ज़िक्र तक नहीं करते। यही रिश्तों की सबसे सच्ची पहचान होती है—जहाँ चिंता है, संवेदना है, लेकिन उसका प्रदर्शन नहीं है। यदि शब्दों को ध्यान से देखें तो फ़क्र और फ़िक्र में केवल एक मात्रा का अंतर है, परंतु फ़िक्र से फ़क्र तक पहुँचने का सफ़र बहुत लंबा और गहरा होता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे दिन का बदलता हुआ रूप—गोधूलि की शांत बेला, फिर गहरी काली रात, और उसके बाद उगते सूर्य की लालिमा से फैलता सुनहरा प्रकाश। महज़ चौबीस घंटों के भीतर प्रकृति के इतने रूप बदल जाते हैं। जीवन भी इसी तरह हमें अनेक अनुभवों और भावनाओं के रंगों से परिचित कराता है। दरअसल, फ़िक्र और फ़क्र आपस में गहराई से जुड़े हुए भाव हैं। जब हम कोई अच्छा कार्य करते हैं, ईमानदारी से अपने दायित्व निभाते हैं या जीवन में कोई उपलब्धि प्राप्त करते हैं, तब हमसे जुड़े लोग हम पर फ़क्र महसूस करते हैं। परंतु याद रखिए—फ़क्र वही करते हैं जिनके मन में हमारे लिए सच्ची फ़िक्र भी होती है। बचपन ...

देश के स्वाभिमानी समाज की ओर से

Image
देश के स्वाभिमानी समाज की ओर से हमारा सरकार से विनम्र निवेदन है कि यूजीसी की ओबीसी सूची से गुर्जर समाज को निकाल दिया जाए, और यदि संभव हो तो हमें ओबीसी श्रेणी से ही बाहर कर दिया जाए। हम न तो स्वयं को शूद्र मानते हैं और न ही सवर्ण। हम अपने को एक बहादुर, मेहनतकश, समतावादी और अन्याय का प्रतिकार करने वाली बिरादरी मानते हैं। हम अपने बल और परिश्रम से जीवन जीने में विश्वास रखते हैं। हमें किसी विशेष कानून या सरकारी संरक्षण की आवश्यकता नहीं है। अतः जब भी भविष्य में संबंधित कानूनों की पुनर्रचना हो, तो उसमें गुर्जर समाज को यूजीसी की ओबीसी सूची से बाहर रखा जाए। हम बड़बोले नहीं हैं, परंतु अपने इतिहास, अपनी सामर्थ्य और समाज की वास्तविकताओं से भली-भाँति परिचित हैं। जो लोग आज अनावश्यक उग्रता और विभाजन की भाषा बोल रहे हैं, यदि वही ऊर्जा उन्होंने 1857 की क्रांति के समय दिखाई होती, तो शायद हमारा देश लगभग 90 वर्ष पहले ही स्वतंत्र हो गया होता। साथ ही, हमारे दो रचनात्मक सुझाव भी हैं। ओबीसी श्रेणी के भीतर भी तुरंत दो पृथक वर्ग बनाए जाएँ—एक खेती-प्रधान और अपेक्षाकृत सशक्त समुदायों के लिए तथा दूसरा कारीगर (आर्ट...

ऐसा भी अक्सर होता है

Image
ऐसा भी अक्सर होता है रचनात्मक मन की दुनिया बड़ी विचित्र होती है। कभी विचारों की धारा इतनी तीव्र बहती है कि शब्द संभाले नहीं संभलते, और कभी ऐसा भी होता है कि सब कुछ होते हुए भी जैसे भीतर एक सन्नाटा उतर आता है। कंप्यूटर के सामने बैठना, देर तक स्क्रीन को निहारना, मन में हल्की-सी हलचल महसूस होना और फिर भी कोई वाक्य जन्म न ले पाना—यह स्थिति असामान्य नहीं है। सच तो यह है कि ऐसा भी अक्सर होता है। जो लोग निरंतर लिखते हैं, वे जानते हैं कि लेखन केवल शब्दों का काम नहीं है; यह मन, संवेदना और अनुभव की सामूहिक प्रक्रिया है। जब मन थक जाता है या भीतर बहुत कुछ एक साथ चल रहा होता है, तब शब्द कुछ समय के लिए ठहर जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे विचारों का स्रोत सूख गया हो, जबकि वास्तव में वह भीतर कहीं और गहराई में उतर रहा होता है। रचनाकार का मन खेत के समान होता है। हर समय उसमें फसल नहीं लहलहाती। कभी-कभी धरती को भी विश्राम चाहिए होता है। यही विश्राम अगली ऋतु में नई हरियाली और नई उपज का कारण बनता है। इसलिए जब कुछ समय तक कुछ लिखा न जा सके, तो इसे रचनात्मकता का अंत नहीं, बल्कि उसके विश्राम का समय समझना चाहिए। कई बा...

विजयसिंह पथिक - स्वेच्छाचार के विरुद्ध एक ज्वलंत जीवन

Image
विजयसिंह पथिक  स्वेच्छाचार के विरुद्ध एक ज्वलंत जीवन “यश, वैभव और सुख की मुझे चाह नहीं, जीवन रहे या न रहे इसकी भी परवाह नहीं। बस एक ही आकांक्षा है— इस संसार में किसी का स्वेच्छाचार और अत्याचार न रहे।” यह केवल शब्द नहीं थे, बल्कि एक ऐसे व्यक्तित्व की आत्मा की पुकार थी जिसने अपना पूरा जीवन अन्याय और दमन के विरुद्ध समर्पित कर दिया। यह जीवन-मंत्र था महान क्रांतिकारी, चिंतक और किसान चेतना के अग्रदूत **विजयसिंह पथिक** का। पथिक जी का जीवन आरंभ से ही संघर्षों से घिरा रहा। माता-पिता का साया बचपन में ही उठ गया। जीवन की पहली ठोकरों ने उन्हें समय से पहले ही परिपक्व बना दिया। वे अपनी बड़ी बहन के पास इंदौर चले गए, जहाँ उनके जीजा सरकारी सेवा में थे। औपचारिक शिक्षा अधिक नहीं मिल सकी; हाई स्कूल से आगे पढ़ने का अवसर भी नहीं मिला। किंतु यह कमी उनके व्यक्तित्व की सीमा नहीं बन सकी। ज्ञान की भूख जब भीतर जलती है तो विद्यालयों की दीवारें भी छोटी पड़ जाती हैं। पथिक जी ने स्वाध्याय को अपना गुरु बनाया। अध्ययन की साधना से उन्होंने अंग्रेज़ी, उर्दू, गुजराती, मारवाड़ी और अनेक क्षेत्रीय भाषाओं पर ऐसा अधिकार प्रा...

श्री रमनपाल सिंह का आत्मकथ्य

Image
 श्री रमनपाल सिंह का आत्मकथ्य  दिनांक 14.03.2026 को वरिष्ठ नागरिक समाज की वार्षिक आम सभा लोंगवुड होटल, ग्रेटर नोएडा में अत्यंत गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुई। इस आयोजन की रूपरेखा तैयार कर मुझे अत्यंत हर्ष और संतोष का अनुभव हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पुलिस उपायुक्त ग्रेटर नोएडा श्री प्रवीण रंजन सिंह रहे, जिनके करकमलों द्वारा वरिष्ठ नागरिक समाज की वार्षिक पत्रिका मंजूषा का विधिवत विमोचन किया गया। यह हमारे समाज के लिए गर्व और प्रेरणा का क्षण था। कार्यक्रम का संचालन समाज के महासचिव श्री गिरीश कुमार राघव ने अत्यंत सुव्यवस्थित और प्रभावी ढंग से किया। इस अवसर पर समाज के अनेक सम्मानित पदाधिकारी और सदस्य उपस्थित रहे, जिनमें अध्यक्ष श्री रमनपाल सिंह, उपाध्यक्ष श्रीमती उर्वशी सिंह, कोषाध्यक्ष देवेंद्र कुमार सिंहल, सहसचिव महीपाल सिंह सहित धर्मचंद, एस.आर. यादव, राजेंद्र कुमार पोरवाल, ए.के. त्रिपाठी, डी.सी. तायल, कुसुम तोमर, सरोज सिंहल, नीलम राघव, मिथलेश तथा सैकड़ों अन्य वरिष्ठ नागरिकों की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम को विशेष बना दिया। इस अवसर पर समाज के लिए सराहनीय योगदान देने वाले...