यह साथ आखिर है क्या?
यह साथ आखिर है क्या? भूमिका कुछ रिश्ते शब्दों में नहीं ढलते, वे बस महसूस किए जाते हैं—धीरे-धीरे, अनकहे, अनजाने। वे किसी परिभाषा के मोहताज नहीं होते, क्योंकि उनका अस्तित्व ही अपने आप में एक गूढ़ व्याख्या होता है। विजया डालमिया की यह रचना ऐसे ही एक संबंध की संवेदनात्मक यात्रा है, जहाँ साथ चलने की निरंतरता तो है, पर उस साथ की प्रकृति को लेकर मन में एक गहरा प्रश्न भी है। “ये कहाँ आ गए हम यूँ ही साथ चलते-चलते...” से आरंभ होती यह अभिव्यक्ति केवल दो व्यक्तियों के बीच के संबंध का चित्रण नहीं, बल्कि उस भावभूमि का विस्तार है जहाँ प्रेम, आदत, अपनापन, दूरी और निकटता—सभी एक साथ गुंथे हुए हैं। यहाँ रिश्ते की जटिलता भी है और उसकी सहजता भी; एक-दूसरे के बिना अधूरे होने का एहसास भी है और उस अधूरेपन को स्वीकार करने की परिपक्वता भी। इस रचना में मौन की भी अपनी भाषा है और स्मृतियों की भी अपनी उपस्थिति। शब्द जहाँ ठहर जाते हैं, वहाँ आँसू बोलने लगते हैं, और जहाँ तर्क समाप्त होते हैं, वहाँ विश्वास अपनी जड़ें और गहरी कर लेता है। यह कविता उन सूक्ष्म भावों को उजागर करती है, जो अक्सर हमारे भीतर होते तो हैं, पर अभिव...