ज़रूरी क्या? (भूमिका सहित)

भूमिका

आज का समय सूचनाओं, दृश्यों और विकल्पों की प्रचुरता का समय है। हर क्षण हमारे सामने जानने, देखने और चुनने के अनगिनत मार्ग खुले रहते हैं। परंतु इसी बहुलता के बीच विवेक का संकट भी उतना ही गहरा हो गया है—क्या जानना उचित है, क्या अनदेखा करना आवश्यक है, और किन राहों पर चलना सार्थक है, इसका निर्णय सरल नहीं रह गया। मनुष्य का मन आकर्षणों से घिरा रहता है, जहाँ आवश्यक से अधिक अनावश्यक का विस्तार दिखाई देता है।

प्रस्तुत पंक्तियाँ इसी सूक्ष्म जीवन-दर्शन को सरल शब्दों में उजागर करती हैं। ये हमें सजग करती हैं कि जीवन में सार्थकता का मार्ग सदैव सीमित होता है, जबकि भ्रम, प्रलोभन और विचलन के मार्ग असंख्य होते हैं। इसलिए चयन ही चरित्र का निर्माण करता है—क्या ग्रहण करना है, क्या त्यागना है, और किस दिशा में आगे बढ़ना है। यह प्रस्तावना पाठक को आत्मचिंतन की उस भूमि पर ले जाने का प्रयास है, जहाँ वह बाहरी भीड़ से हटकर अपने भीतर के विवेक को सुन सके और कम किन्तु सही विकल्पों की ओर उन्मुख हो सके।

ज़रूरी क्या?

जिनको जानना चाहिए आपको, 

ऐसी बातें हैं बहुत कम। 

जिनको नहीं जानना चाहिए आपको, 

ऐसी बातें हैं बहुत सी। 

जिनको देखना चाहिए आपको, 

ऐसी चीजें हैं बहुत कम। 

जिनको नहीं देखना चाहिए आपको, 

ऐसी चीजें हैं बहुत सी।

जिन पर चलना चाहिए आपको,

ऐसी राहें हैं बहुत कम। 

जिन पर नहीं चलना चाहिए आपको, 

ऐसी राहें हैं बहुत सी।

सृजक

 
                                          श्री लालबहार जी
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 









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