प्रोफेसर राकेश राणा का आत्मकथ्य
प्रोफेसर राकेश राणा का आत्मकथ्य
दिनांक 27-28 फरवरी, 2026 को रसायन विज्ञान विभाग, एम.एम.एच. कॉलेज, गाजियाबाद द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी “क्लाइमेट चेंज एंड सोशल जस्टिस: चैलेंजेस एंड सॉल्यूशंस ऑफ एनवायरनमेंटल जस्टिस” में सहभागिता मेरे लिए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं प्रेरणादायी अनुभव रहा। इस संगोष्ठी का आयोजन आई.सी.एस.एस.आर., निक्सी, दिल्ली; आई.आई.एम., नई दिल्ली तथा सेंट्रल बैंक के सहयोग से किया गया था।
उद्घाटन सत्र का वातावरण अत्यंत गरिमामय था। दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वंदना से कार्यक्रम का प्रारंभ हुआ, जिसने भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और आधुनिक वैज्ञानिक विमर्श के सुंदर समन्वय को दर्शाया। देश-विदेश के विद्वानों की उपस्थिति ने इस संगोष्ठी को वास्तव में अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। उज्बेकिस्तान से प्रोफेसर ओलीम रूजीमुरादेव का आभासी बीज वक्तव्य विशेष रूप से विचारोत्तेजक रहा। उन्होंने ग्रीनहाउस प्रभाव के परिणामस्वरूप उत्पन्न जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को वैज्ञानिक तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया।
मुख्य अतिथि प्रोफेसर राणा प्रताप सिंह, कुलपति, गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय, ने जलवायु परिवर्तन को वैश्विक संकट बताते हुए इसके सामाजिक, आर्थिक और स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों पर गंभीर चिंता व्यक्त की। विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर बी. डब्ल्यू. पाण्डेय, डीन, सेंटर फॉर हिमालयन स्टडीज़, दिल्ली ने भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में निहित प्रकृति-पूजन की भावना को पर्यावरण संरक्षण की आधारशिला बताया। उनके विचारों ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया, क्योंकि उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ सांस्कृतिक चेतना का समन्वय प्रस्तुत किया।
प्रथम तकनीकी सत्र में प्रोफेसर आर. के. सोनी द्वारा उन्नत ऑक्सीडेशन तकनीकों के माध्यम से फार्मास्यूटिकल एवं माइक्रोप्लास्टिक अपशिष्ट के निवारण पर प्रस्तुत शोध अत्यंत उपयोगी रहा। डॉ. एस. के. त्यागी ने जलवायु परिवर्तन और सामाजिक असमानता के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डालते हुए प्रदूषण के विविध स्रोतों—परिवहन, पराली दहन, ईंट-भट्टों तथा औद्योगिक उत्सर्जन—को रेखांकित किया। प्रोफेसर तरुण गुप्ता, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर, द्वारा एरोसोल मापन एवं नियंत्रण उपकरणों पर दिया गया व्याख्यान औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत श्रमिकों की सुरक्षा के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक था।
संगोष्ठी के दौरान यह अनुभव हुआ कि जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरणीय विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय से गहराई से जुड़ा प्रश्न है। पर्यावरणीय क्षरण का सबसे अधिक प्रभाव समाज के वंचित वर्गों पर पड़ता है; अतः समाधान भी समावेशी और न्यायपूर्ण होने चाहिए।
भोजनावकाश के पश्चात विभिन्न सभागारों में आयोजित समानांतर तकनीकी सत्रों एवं ऑनलाइन प्रस्तुतियों ने शोधार्थियों को अपने विचार साझा करने का व्यापक मंच प्रदान किया। युवा शोधकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी ने भविष्य के प्रति आशा और विश्वास को सुदृढ़ किया।
समग्र रूप से, यह संगोष्ठी मेरे लिए ज्ञान-विस्तार, चिंतन-मनन तथा संवाद का एक सशक्त माध्यम सिद्ध हुई। मुझे विश्वास है कि ऐसे अकादमिक आयोजन न केवल बौद्धिक विमर्श को समृद्ध करते हैं, बल्कि समाज में पर्यावरणीय चेतना और न्यायपूर्ण विकास की दिशा में ठोस कदम भी सुनिश्चित करते हैं।
झलकियाँ
सूचना स्रोत
प्रोफेसर (डॉ) राकेश राणा










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