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Showing posts from August, 2025

आत्मविवरणात्मक आभार : शब्दों की मुस्कान

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आत्मविवरणात्मक आभार : शब्दों की मुस्कान (लेखिका श्रीमती कविता अग्रवाल की ओर से) "आज का दिन मेरे लिए केवल एक साहित्यिक पड़ाव नहीं, बल्कि मेरे जीवन की अनमोल स्मृति बन गया है। शब्दों की मुस्कान का विमोचन राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर के सहयोग से संभव हुआ। इसके लिए मैं अकादमी के सचिव आदरणीय डॉ. बसंत सिंह सोलंकी जी की विशेष आभारी हूँ, जिनके प्रोत्साहन ने मेरी रचनात्मक यात्रा को नई ऊर्जा दी। मुख्य अतिथि आदरणीय डॉ. इंदुशेखर तत्पुरुष जी के स्नेहिल और गहन विचार मेरे लिए मार्गदर्शन हैं। उनके आशीर्वचन ने मेरी लेखनी में और विश्वास जगाया। विशिष्ट अतिथि श्री रास बिहारी गौड़ जी का स्नेहिल स्वागत वचन और गहरी टिप्पणी मेरे लिए प्रेरणा है। उनके शब्दों ने मुझे यह अनुभव कराया कि स्त्री लेखन की राह भले कठिन हो, परंतु संवेदना और साहस इसे अर्थपूर्ण बना देते हैं। डॉ. मधु खंडेलवाल जी ने जिस स्नेह के साथ मेरी रचनाओं को जीवन के विभिन्न रंगों की अभिव्यक्ति कहा और मुझे ‘काव्यम’ नाम से सुशोभित किया—यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा सम्मान है। अब यह नाम मेरी पहचान का अभिन्न हिस्सा रहेगा। मैं अपने पिता श्री पी. एम. अग्...

राष्ट्रीय बाल साहित्यकार सम्मेलन

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भूमिका   सोलहवें राष्ट्रीय बाल साहित्यकार सम्मेलन के तकनीकी सत्र की अध्यक्षता राजस्थान के वरिष्ठ साहित्यकार, आर ए एस अधिकारी एवं पाती लेखन मुहिम के प्रणेता डॉ. सूरज सिंह नेगी ने की तो उन्होंने कार्यक्रम में अपने विचार व्यक्त करते हुए अपने विचार व्यक्त किये।  विवरण उदयपुर (पुकार)। सलिला संस्था सलूंबर एवं राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में प्रसार शिक्षा निदेशालय संभागर में आयोजित 16वें राष्ट्रीय बाल साहित्यकार सम्मेलन के तकनीकी सत्र की अध्यक्षता राजस्थान के वरिष्ठ साहित्यकार, आर ए एस अधिकारी एवं पाती लेखन मुहिम के प्रणेता डॉ. सूरज सिंह नेगी ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. नेगी ने आज के बदलते परिवेश की सबसे गंभीर चुनौती की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि – “सोशल मीडिया ने बच्चों के जीवन को सुविधा दी है, लेकिन इसका अंधाधुंध प्रयोग उन्हें मोबाइल का गुलाम बनाता जा रहा है। बचपन, जो कभी खेल, कहानी और किताबों की सुगंध से भरा होता था, अब स्क्रीन की रोशनी में कैद होता जा रहा है।” उन्होंने कहा कि समाज को चाहिए कि बच्चों को जीवंत उदाहरणों से जोड़ा जाए। आदर्श के...

देश के युवाओं का आह्वान

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भूमिका एक जिम्मेदार भारतीय नागरिक की पाती है ये देश के युवा वर्ग के लिए। उनको उनके दायित्वों का भान कराने के लिए। पाती प्रिय युवाओ, भारत एक ऐसा देश है जिसकी पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक विविधता से होती है। यह विविधता हर गाँव, हर शहर, हर बोली और हर रीति-रिवाज में झलकती है। हमारे यहाँ जीवन के हर छोटे-बड़े अवसर को त्योहार के रूप में मनाने की परंपरा है। यही परंपरा हमारी जीवंत संस्कृति का प्रतीक है। त्योहार हमें रंगों से नहीं, रिश्तों से रोशन करते हैं। युवा पीढ़ी जब परंपरा अपनाती है, तो संस्कृति अमर हो जाती है।" तीज-त्योहार केवल रीति या परंपरा नहीं हैं, ये लोक जीवन की धड़कन हैं। ये हमें प्रेरित करते हैं कि जीवन का असली सुख केवल पाने में नहीं, अपितु बाँटने में है। सावन की तीज जहाँ प्रकृति और नारी की पावन शक्ति का उत्सव है, वहीं राखी का धागा भाई-बहन के रिश्तों की गहराई दर्शाता है। दीपावली का प्रकाश अंधकार से ज्ञान की ओर ले जाता है और होली के रंग भेदभाव मिटाकर मिलन का संदेश देते हैं। हर पर्व है एक दीपक, जो हमें अंधेरों से निकालता है। युवा हाथों से जब ये दी...

मनःस्थिति की समझ

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  प्रस्तावना मेरठ के पूर्व महापौर सुशील गुर्जर का यह संदेश केवल शब्दों का संकलन नहीं, बल्कि जीवन के संघर्षों और अनुभवों से उपजी गहन संवेदना है। सार्वजनिक जीवन में रहते हुए उन्होंने प्रत्यक्ष देखा है कि कठिनाइयों की घड़ी में लोग किस तरह आर्थिक और भौतिक सहायता पहुँचाते हैं, परंतु उससे भी कहीं अधिक मूल्यवान है मानवीय साथ और आत्मीयता। यह लेख इसी सत्य को रेखांकित करता है कि नि:स्वार्थ खड़ा होना, किसी के आँसुओं को समझना और मौन को सुनना—वह ताक़त है जो समाज को वास्तविक रूप से मज़बूत बनाती है। पूर्व मेयर का यह विचार न केवल व्यक्तिगत जीवन को दिशा देता है बल्कि सामूहिक चेतना को भी जागृत करता है, ताकि हम सब मदद के साथ-साथ दिल और समय भी बाँटने का संकल्प ले सकें। यही भावना इंसानियत का आधार है और यही समाज को हर कठिनाई से पार ले जाने की असली शक्ति भी। संबोधन मेरे प्यारे साथियो, जीवन में हम सबने देखा है—संकट के समय लोग आगे बढ़कर मदद करते हैं, कोई धन देता है, कोई साधन, कोई सुविधा… और यह सब निश्चय ही सराहनीय है। लेकिन मैंने अपने अनुभव से एक बात बहुत गहराई से महसूस की है— "सहायता से भी ज़्यादा ज़रूरी...

अवतरण शब्द - एक विमर्श

भूमिका   "अवतरण शब्द : एक विमर्श" शीर्षक स्वयं में ही संकेत करता है कि शब्द मात्र उच्चारण नहीं होते, बल्कि वे विचार, भाव और दृष्टिकोण के अवतरण हैं। शब्द जब विमर्श का आधार बनते हैं तो वे व्यक्ति और समाज के मध्य एक सेतु का कार्य करते हैं। यह आलेख शब्दों की शक्ति को उस संदर्भ में परखने का प्रयास है जहाँ विभिन्न पक्ष आपस में जुड़े हुए हैं—विचार से अभिव्यक्ति, अभिव्यक्ति से संवाद, और संवाद से समाज का विकास। विमर्श की यही शृंखला लोगों के बीच न केवल परस्पर समझ को गहराती है, बल्कि उनके बीच जुड़ाव और आत्मीयता भी स्थापित करती है। इस प्रकार यह आलेख स्पष्ट करता है कि अवतरण शब्द केवल भाषा की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक अंतर्संबंधों को प्रखर करने वाला माध्यम भी हैं। अवतरण शब्द : एक विमर्श भारतवर्ष उत्सवप्रिय देश है। यहाँ प्रतिदिन किसी न किसी रूप में उत्सव मनाया जाता है। जन्मदिन भी उसी परम्परा का एक जीवंत उदाहरण है। आजकल प्रचलन बन गया है कि किसी के जन्मदिन पर उसे “अवतरण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ” दी जाती हैं। यह वाक्य भले ही आकर्षक प्रतीत होता हो, किन्तु भाषा और अर्थ की दृष्टि से साधु न...

कथन विशेष

आचार्य निखिल का प्रस्तुत कथन — "’पश्चाताप’… बोले गए ‘शब्दों’ का ही हो, यह जरूरी नहीं..! कभी - कभी समय पर न बोलने का ‘पश्चाताप’ भी, जीवन भर रहता है..!" — अत्यंत सूक्ष्म और जीवनानुभव पर आधारित है। विश्लेषण 1. शब्दों का भार और असर    सामान्यत: हम यह मानते हैं कि गलत या कठोर शब्द बोल देने से पश्चाताप होता है।    लेकिन कथनकार यहाँ एक और गहरी सच्चाई पर ध्यान दिलाता है—कभी चुप रहने से भी जीवन में भारी पछतावा हो सकता है। 2. समय की अहमियत    हर स्थिति में बोलने या न बोलने का एक उपयुक्त समय होता है।    यदि उस समय हम मौन रहे, तो बाद में चाहकर भी वह अवसर वापस नहीं आता।    जैसे किसी से क्षमा माँगने का अवसर, किसी को प्रोत्साहित करने का पल, अपने मन की बात कहने का मौका, या किसी अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने का क्षण। 3. जीवन का स्थायी बोझ    बोले गए शब्द प्रायः सुधारे जा सकते हैं—माफी माँगकर, रिश्ते जोड़कर।    लेकिन न बोले गए शब्द अक्सर भीतर ही भीतर टीस छोड़ जाते हैं, और यह पश्चाताप उम्र भर पीछा करता है। कथनकार की मंशा आचार्य निखिल का...

संदेशों को स्पष्टता देने की कवायद

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  भूमिका जीवन में संदेश ही वे सूत्र हैं जो विचारों, भावनाओं और उद्देश्यों को आपस में जोड़ते हैं। किंतु जब संदेशों में स्पष्टता का अभाव होता है तो मनोभाव भी भ्रमित हो जाते हैं और संवाद अपनी शक्ति खो बैठता है। इसलिए "संदेशों को स्पष्टता देने की कवायद" केवल शब्दों को सुस्पष्ट करने का अभ्यास नहीं है, बल्कि यह विचारों को पारदर्शी बनाने और भावनाओं को प्रभावी अभिव्यक्ति देने का प्रयास है। यही स्पष्टता वह सेतु है जो हृदय और मस्तिष्क दोनों को जोड़कर संप्रेषण को सार्थक बनाती है। संदेशों को स्पष्टता देने की कवायद "जिन लोगों को सभी में बुराई ढूंढने की आदत होती है, वे आपकी बुराई ही करेंगे। आप ऐसे लोगों के लिए अच्छे हों या बुरे, आप शांत भाव से अपने कर्म करते रहिए । निंदा से मत घबराइए क्योंकि निंदा उन्हीं की होती है जो जिंदा होते हैं। मरने के बाद तो सबकी तारीफ ही होती है।" इस संदेश को 'उलझन सुलझन' मासिक स्पष्ट कर देने की इच्छुक है क्योंकि आज हर व्यक्ति, बिना संदेश के वास्तविक भाव को समझे, कुछ न कुछ साझा करने को आतुर है ।  उपर्युक्त संदेश में निंदा शब्द का उपयोग बहुत सही न...

शब्दों से समझ का विकास

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भूमिका मानव जीवन में शब्द केवल संप्रेषण का माध्यम भर नहीं, बल्कि विचारों और भावनाओं के संवाहक भी हैं। शब्दों से ही समझ का विकास होता है, क्योंकि वे मन और मस्तिष्क के बीच सेतु का कार्य करते हैं। जब विचार शब्दों में ढलते हैं, तो न केवल व्यक्ति अपनी अभिव्यक्ति को स्पष्ट करता है, बल्कि दूसरों के अनुभवों, ज्ञान और दृष्टिकोण से भी परिचित होता है। यही प्रक्रिया समझ को गहराई देती है और संवाद को सार्थक बनाती है। अतः कहा जा सकता है कि शब्दों की शक्ति से ही मानवीय चेतना का विस्तार और सामाजिक समरसता का निर्माण संभव है। कथन की स्पष्टता  उद्यमी नरेंद्र सिंह ने जो कहा – "उलझनें मैंने कई झुक के भी सुलझाई हैं। तभी पाया कि सब लोग क़द के बराबर तो नहीं होते!" यह बहुत गहराई से भरा हुआ कथन है। इसका विश्लेषण इस प्रकार किया जा सकता है – 1. सतही स्तर पर * "झुक के सुलझाई" का अर्थ है कि वक्ता ने अपने अहंकार को त्याग कर, विनम्र होकर, दूसरों के साथ समझौता करके या उनका मान रखते हुए समस्याओं को हल किया। * लेकिन इस प्रक्रिया में उसने यह अनुभव किया कि सब लोग समान मानसिकता, समान सोच, या सम...

ललिता जी पारिक का शैक्षणिक श्रम

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भूमिका  शैक्षणिक परिवेश में प्रस्तुतीकरण केवल ज्ञान के आदान-प्रदान का साधन नहीं होता, बल्कि यह व्यक्तित्व और आत्मविश्वास की झलक भी प्रस्तुत करता है। आत्मविश्वास वह शक्ति है जो विद्यार्थी या प्रस्तुतकर्ता को अपने विचारों को स्पष्टता, सहजता और प्रभावशीलता के साथ सामने रखने में सक्षम बनाती है। जब वक्ता अपने विषय पर विश्वास के साथ बोलता है, तो श्रोता न केवल उसकी बातों को गंभीरता से ग्रहण करते हैं, बल्कि उससे प्रेरित भी होते हैं। इस प्रकार आत्मविश्वास प्रस्तुतीकरण की प्रभावशीलता का आधार बनकर शैक्षणिक वातावरण को अधिक जीवंत, संवादात्मक और सार्थक बना देता है। राज्य स्तरीय कार्यशाला में मेरी प्रस्तुति  शिक्षण में टीएलएम और एपीएल किट का महत्व शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह बच्चों के सर्वांगीण विकास का माध्यम है। जब हम बच्चों को कक्षा में पढ़ाते हैं तो केवल पाठ्यपुस्तक और ब्लैकबोर्ड तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं होता। बच्चे तब बेहतर सीखते हैं जब वे स्वयं गतिविधियों में भाग लेते हैं, अपनी आँखों से देखते हैं, हाथों से अनुभव करते हैं और सोचकर प्रश्न पूछते हैं। इ...

🌈 'सतरंगे मोती' — मेरी दृष्टि से

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 भूमिका एक   लेखक का अपने विचार को  भव्य स्वरूप में मूर्त रूप देना उसका सपना होता है और उसका विवरण प्रदान करना उस स्वप्न का अनूठा विस्तार।  🌈 'सतरंगे मोती' — मेरी दृष्टि से (लेखिका रेखा जैन 'प्रकाश' का आत्मावलोकन) आज का दिन… 17 अगस्त 2025, टोंक का यह उजला रविवार, मेरी स्मृतियों में हमेशा-हमेशा के लिए सतरंगे अक्षरों में अंकित हो गया। मेरी पुस्तक 'सतरंगे मोती' का विमोचन हुआ—पर सच कहूँ, यह केवल पुस्तक का विमोचन नहीं था, बल्कि मेरी आत्मा का उद्घाटन था, मेरे जीवन की साधना का प्रस्फुटन था।  📖 शब्दों की यात्रा—बचपन से आज तक जब मैं बचपन में छोटी-सी डायरी में मासूम भाव लिखती थी, तब सोच भी नहीं सकती थी कि वे बीज कभी इतने बड़े वृक्ष का रूप लेंगे। आज मंच पर खड़ी होकर जब मैंने अपनी पठन-लेखन यात्रा को साझा किया, तो लगा जैसे *मेरी डायरी के पन्ने स्वयं चलकर लोगों के दिलों तक पहुँच गए हों।  🌺 सरस्वती की छाँव में आरंभ समारोह की शुरुआत हनुमान बादाम जी द्वारा सरस्वती वंदना से हुई। जब उनके स्वर गूँजे, मुझे ऐसा लगा जैसे माँ सरस्वती ने मेरे मन के उन शब्दों को आशीष दे दिया हो, ...

वीडियो को समझने का प्रयास

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वीडियो संदर्भ https://youtu.be/6Ie_PIj57lc?si=ub7DTQUTxXaZU5n6 सारांश यह चर्चा गुर्जर समुदाय के राजनीतिक परिदृश्य पर केंद्रित है, विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश (UP), एनसीआर, हरियाणा और दिल्ली में। ऐतिहासिक रूप से गुर्जरों का राजनीति में महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है, जहाँ समुदाय के नेता उपमुख्यमंत्री जैसे ऊँचे पदों तक पहुँचे। इस समुदाय का जाटों जैसे प्रभावशाली जातिगत समूहों के साथ मज़बूत तालमेल रहा, जिनका नेतृत्व चौधरी चरण सिंह और रामचंद्र विकल जैसे दिग्गज नेताओं ने किया। लेकिन समय के साथ यह राजनीतिक एकता आंतरिक मतभेदों, प्रगतिशील नेतृत्व की कमी और दलों व मीडिया की विभाजनकारी राजनीति के कारण कमजोर हो गई। गुर्जरों की राजनीतिक मौजूदगी "घराना-आधारित" राजनीति से बदलकर व्यवसाय-प्रभावित नेतृत्व तक आ गई, जिससे प्रतिबद्ध और दूरदर्शी नेताओं की कमी के कारण बिखरी हुई प्रतिनिधित्व की स्थिति पैदा हुई। राजस्थान में कर्नल किरोड़ी सिंह बैसला के नेतृत्व में गुर्जर आरक्षण आंदोलन ने समुदाय की राजनीतिक लामबंदी की ताकत और सीमाएँ दोनों उजागर कीं, लेकिन यह आंदोलन हिंसा और नेतृत्व की कमियों से भी घिरा रहा...

अनकही अनुभूति – पाँचली से नमो भारत तक

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भूमिका “अनकही अनुभूति – पाँचली से नमो भारत तक” यह शीर्षक अपने आप में एक यात्रा है—गाँव की पगडंडियों पर चलते हुए साधारण जनजीवन की झलक से लेकर उस राष्ट्रीय चेतना तक, जिसने पूरे भारत को एक नये दृष्टिकोण से देखने का अवसर दिया। आमजन का जीवन प्रायः शब्दों से नहीं, बल्कि अनुभूतियों से व्यक्त होता है। खेतों में काम करती हथेलियाँ, चूल्हे की आँच से तपते चेहरे, बच्चों की मासूम हँसी, वृद्धों की आँखों में ठहरी उम्मीद—इन सबमें एक अनकही भाषा बोलती है। यह भाषा न नारों की है, न ही बड़े-बड़े भाषणों की; यह तो मन की गहराई से उपजने वाली वे भावनाएँ हैं जिन्हें शब्दों में कहना कठिन है। यही अनकही अनुभूतियाँ समय-समय पर समाज को चौंकाती भी हैं। जब लगता है कि सब कुछ साधारण और स्थिर है, तभी अचानक साधारण जन अपनी चुप्पी तोड़कर असाधारण परिवर्तन की पृष्ठभूमि रच देता है। यही आश्चर्य, यही विस्मय—इस यात्रा का सार है। इस शीर्षक में उन भावनाओं की खोज है, जो अनकही होते हुए भी हृदयों को जोड़ती हैं। यह उन सरल मगर गहन अनुभवों का दस्तावेज़ है, जिनकी गूँज पाँचली (गाँव की परंपरा, मिट्टी, संस्कृति) से लेकर आज की 'नमो भारत'...