देश के स्वाभिमानी समाज की ओर से
देश के स्वाभिमानी समाज की ओर से
हमारा सरकार से विनम्र निवेदन है कि यूजीसी की ओबीसी सूची से गुर्जर समाज को निकाल दिया जाए, और यदि संभव हो तो हमें ओबीसी श्रेणी से ही बाहर कर दिया जाए। हम न तो स्वयं को शूद्र मानते हैं और न ही सवर्ण। हम अपने को एक बहादुर, मेहनतकश, समतावादी और अन्याय का प्रतिकार करने वाली बिरादरी मानते हैं।
हम अपने बल और परिश्रम से जीवन जीने में विश्वास रखते हैं। हमें किसी विशेष कानून या सरकारी संरक्षण की आवश्यकता नहीं है। अतः जब भी भविष्य में संबंधित कानूनों की पुनर्रचना हो, तो उसमें गुर्जर समाज को यूजीसी की ओबीसी सूची से बाहर रखा जाए।
हम बड़बोले नहीं हैं, परंतु अपने इतिहास, अपनी सामर्थ्य और समाज की वास्तविकताओं से भली-भाँति परिचित हैं। जो लोग आज अनावश्यक उग्रता और विभाजन की भाषा बोल रहे हैं, यदि वही ऊर्जा उन्होंने 1857 की क्रांति के समय दिखाई होती, तो शायद हमारा देश लगभग 90 वर्ष पहले ही स्वतंत्र हो गया होता।
साथ ही, हमारे दो रचनात्मक सुझाव भी हैं। ओबीसी श्रेणी के भीतर भी तुरंत दो पृथक वर्ग बनाए जाएँ—एक खेती-प्रधान और अपेक्षाकृत सशक्त समुदायों के लिए तथा दूसरा कारीगर (आर्टिजन) वर्ग के लिए। इससे हमारे उन अपेक्षाकृत कमजोर भाइयों को भी न्यायसंगत अवसर मिल सकेगा, जिन्हें वास्तव में अधिक सहायता की आवश्यकता है।
आज जिस प्रकार कुछ लोग यूजीसी के नाम पर समाज में नफरत फैलाने का प्रयास कर रहे हैं, वह देश के हित में नहीं है। हम इस विवाद में न तो पक्ष बनना चाहते हैं और न ही विपक्ष। हमें शांति और सम्मान के साथ देश की उन्नति में अपना योगदान देने दीजिए।
हम विदेशी आक्रमणों और चुनौतियों से लड़ने की परंपरा रखते हैं; भारत के सभी नागरिक हमारे भाई हैं। हम किसी से नफरत नहीं करते। हम ब्राह्मण से पूजा करवाकर उसे सम्मानपूर्वक दान देते हैं, और खेत में काम करने वाले दलित श्रमिक को भी उचित और न्यायसंगत मजदूरी देते हैं।
इसी प्रकार हिंदू-मुस्लिम विवादों की राजनीति से भी हम चाहते हैं कि गुर्जर समाज अलग रहे। गुर्जर सभी धर्मों में पाए जाते हैं और हम सबका सम्मान करते हैं।
हमने अनेक देशों की सभ्यताओं और उनके इतिहास का अध्ययन किया है। हमने यह भी देखा है कि राष्ट्र समृद्ध कैसे बनते हैं और नष्ट कैसे होते हैं। इससे हमने यही सीखा है कि जो राष्ट्र अपने नागरिकों के बीच मतभेद कम कर देता है, वही वास्तव में शक्तिशाली बनता है।
दुर्भाग्य से हमारे यहाँ कुछ लोग हिंदू-मुस्लिम विवाद और दलित-स्वर्ण संघर्ष की राजनीति को बढ़ावा देकर देश को कमजोर करने की दिशा में ले जा रहे हैं। यदि संभव हो तो अपने किसी मंत्री को बोत्सवाना जैसे देश में भेजिए, जहाँ की शिक्षा-प्रणाली में यह पढ़ाया जाता है कि राष्ट्रीय एकता ही समृद्धि का आधार है। वहाँ की बोत्सवाना डेमोक्रेटिक पार्टी से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
1960 में स्वतंत्र होने के समय उस देश के पास केवल लगभग 12 किलोमीटर पक्की सड़कें थीं और मात्र 22 लोग ऐसे थे जिन्होंने कक्षा 12 तक शिक्षा प्राप्त की थी। लेकिन आज वही देश आत्मसम्मान के साथ दुनिया के सामने खड़ा है।
इसके विपरीत, हमारे पास हजारों वर्षों की गौरवमयी परंपरा, ज्ञान और सामाजिक अनुभव है, फिर भी हम मतभेदों की दिशा में बढ़ते जा रहे हैं। यह स्थिति चिंताजनक है।
यह पत्र हम शीघ्र ही देश के सभी सांसदों को भी भेजने का विचार रखते हैं।
रचनाकार
एडवोकेट विजेन्द्र कसाना जी की वाल से श्री हरेंद्र जैनर जी के सौजन्य से कसाना जी की अनुमति से साभार (C&P)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति




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