यह साथ आखिर है क्या?

यह साथ आखिर है क्या?

भूमिका

कुछ रिश्ते शब्दों में नहीं ढलते, वे बस महसूस किए जाते हैं—धीरे-धीरे, अनकहे, अनजाने। वे किसी परिभाषा के मोहताज नहीं होते, क्योंकि उनका अस्तित्व ही अपने आप में एक गूढ़ व्याख्या होता है। विजया डालमिया की यह रचना ऐसे ही एक संबंध की संवेदनात्मक यात्रा है, जहाँ साथ चलने की निरंतरता तो है, पर उस साथ की प्रकृति को लेकर मन में एक गहरा प्रश्न भी है।

“ये कहाँ आ गए हम यूँ ही साथ चलते-चलते...” से आरंभ होती यह अभिव्यक्ति केवल दो व्यक्तियों के बीच के संबंध का चित्रण नहीं, बल्कि उस भावभूमि का विस्तार है जहाँ प्रेम, आदत, अपनापन, दूरी और निकटता—सभी एक साथ गुंथे हुए हैं। यहाँ रिश्ते की जटिलता भी है और उसकी सहजता भी; एक-दूसरे के बिना अधूरे होने का एहसास भी है और उस अधूरेपन को स्वीकार करने की परिपक्वता भी।

इस रचना में मौन की भी अपनी भाषा है और स्मृतियों की भी अपनी उपस्थिति। शब्द जहाँ ठहर जाते हैं, वहाँ आँसू बोलने लगते हैं, और जहाँ तर्क समाप्त होते हैं, वहाँ विश्वास अपनी जड़ें और गहरी कर लेता है। यह कविता उन सूक्ष्म भावों को उजागर करती है, जो अक्सर हमारे भीतर होते तो हैं, पर अभिव्यक्ति नहीं पा पाते।

विजया डालमिया ने इस रचना के माध्यम से एक ऐसे रिश्ते की तस्वीर उकेरी है, जो नाम से परे है—पर एहसास में पूर्ण है। यह पाठक को अपने ही जीवन के किसी ऐसे संबंध की याद दिला देती है, जिसे वह शायद कभी शब्द नहीं दे पाया, पर दिल में संजोए रहा।

यह रचना केवल पढ़ी नहीं जाती, बल्कि जी जाती है—हर उस व्यक्ति के द्वारा, जिसने कभी किसी के साथ चलते-चलते खुद से यह प्रश्न किया हो कि “यह साथ आखिर है क्या?”

कविता

ये कहाँ आ गए हम.... 

यूँ ही साथ चलते-चलते.....

...चल तो रहे हैं हमसफर बनकर... 

...कि साथ है भी या नहीं...

...या ये महज आदत है...

... कि हम एक-दूसरे की आवाज सुने बगैर रह नहीं सकते....

... कि हम एक-दूसरे से लड़े बगैर हँस नहीं सकते....

... कि हम एक-दूसरे की फिक्र किये बगैर जी नहीं सकते...

 ...बड़ा ही अद्भुत और अजब गजब रिश्ता है हमारा...

... कि एक पल की दूरी सही नहीं जाती और दूर हैं इतने कि नजर भर आती...

... लिखने को कितना कुछ है हमारे पास...

 ...पर प्यार की बातें पाती नहीं बन पातीं...

 ...सहने को यादें ही एक मात्र सहारा हैं..

 ...कि जिनके बिना हमारी दुनिया बस नहीं पाती...

... कहने को मौन आँसुओं की भाषा है...

... जो बहकर ही सब कह जाती... 

...कि मजबूर इस कदर हैं कि...

 ...हर पल हम बिखर जाएं...

... पर रिश्ते इतने मजबूत हैं...

 ...कि कोई लहर हिला नहीं पाती....

... कि यकीन तो एक पल का भी नहीं

 ...पर भरोसा इस कदर है... 

...कि सदियां उसमें समा जाती...

 ...कि उलझनें बहुत हैं मगर वो... 

...उलझने से पहले ही सुलझ जातीं...

...कि इसे क्या नाम दूँ...

... बस यही सोचते रह जाती...

रचनाकार

विजया डालमिया

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 





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