होली दिल से खेलें… चालाकी से नहीं
होली दिल से खेलें… चालाकी से नहीं
होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि मनुष्यता की भीतरी परतों को उजागर करने वाला एक आत्मिक पर्व है। यह हमें याद दिलाता है कि रंगों की असली चमक बाहर से नहीं, भीतर से आती है। पानी का अपना कोई रंग नहीं होता, फिर भी वही हर रंग को जीवंत बना देता है। ठीक उसी प्रकार प्रेम का भी कोई स्वरूप नहीं होता, किंतु उसके बिना जीवन की समस्त रंगत फीकी पड़ जाती है। जब रंग पानी में घुलते हैं तो स्थायी छाप छोड़ते हैं, और जब जीवन प्रेम में घुलता है तो अर्थपूर्ण बन जाता है।
आज के समय में होली खेलने का ढंग बदल रहा है। बाहरी रंगों की चमक बढ़ी है, परन्तु भावों की गहराई कहीं-कहीं कम होती दिखती है। ऐसे में “होली दिल से खेलें… चालाकी से नहीं” का संदेश अत्यंत सार्थक हो उठता है। क्योंकि रंगों का असली उद्देश्य हृदयों को जोड़ना है, न कि मनों में दूरी या आडंबर पैदा करना। सूखे रंग हवा में उड़कर बिखर जाते हैं, पर जब उन्हें स्नेह के जल में घोलकर लगाया जाता है तो वे स्मृति बन जाते हैं। इसी प्रकार औपचारिक व्यवहार क्षणिक होता है, जबकि सच्चा अपनापन जीवन भर की छाप छोड़ जाता है।
मानव जीवन स्वयं एक रंगमयी यात्रा है। हर रंग एक भाव का प्रतिनिधित्व करता है—कहीं मस्ती की ऊर्जा, कहीं विरह का नीलापन, कहीं आशा का उजास। प्रेम से भरा हृदय इन रंगों को संतुलित करता है, परंतु जब मन सूखने लगता है तो बाहरी रंग भी बेरंग प्रतीत होने लगते हैं। यही वह स्थिति है जब व्यक्ति के भीतर का शून्य बाहर के उत्सव को भी अर्थहीन बना देता है। इसलिए होली का वास्तविक संदेश है—पहले भीतर के सूखेपन को प्रेम से सींचना, ताकि बाहर के रंग भी सार्थक लगें।
उज्ज्वल भावों और कलुषता का द्वंद्व भी इसी संदर्भ में समझा जा सकता है। कुछ लोग शब्दों से खेलते हैं और कुछ जज़्बातों से। उनकी चतुराई अक्सर मुस्कान के आवरण में छिपी रहती है, पर भीतर कहीं न कहीं संवेदनाओं को आहत कर देती है। ऐसे व्यवहार में रंग तो दिखते हैं, पर उनमें आत्मीयता का जल नहीं होता। परिणामस्वरूप संबंधों की सतह चमकीली दिखाई देती है, पर भीतर भावहीनता का सूखा विस्तार होता जाता है। यह वही कलुषता है जो धीरे-धीरे जीवन के रंगों को धूमिल कर देती है।
इसके विपरीत, सच्चे उज्ज्वल भाव वह होते हैं जो किसी के दर्द भरे नेत्रों में आशा के रंग भर दें, किसी निराश मन को जीने की वजह दे दें। होली का वास्तविक सौंदर्य इसी में है कि हम अपने व्यवहार, शब्द और संवेदनाओं से किसी के जीवन में रंग भरें। यदि हमारे शब्द किसी को शब्दहीन और भावविहीन कर दें, तो वह रंग नहीं, बल्कि एक प्रकार की नीरसता है। और यदि हमारी उपस्थिति किसी के मन में ऊर्जा, विश्वास और प्रेम का संचार करे, तो वही सच्ची होली है।
जीवन में रंग केवल बाहर नहीं, भीतर भी बसते हैं। जब भीतर करुणा, प्रेम और सहानुभूति के रंग जीवित रहते हैं, तब बाहरी उत्सव भी सार्थक लगते हैं। पर जब मन में छल, चतुराई और संवेदनहीनता घर कर लेती है, तब रंगों का पर्व भी केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है। यही कारण है कि चालाकी से खेली गई होली क्षणिक हँसी तो दे सकती है, पर दिल से खेली गई होली स्थायी स्मृतियाँ और रिश्तों की मिठास छोड़ जाती है।
अतः इस होली का संदेश स्पष्ट है—रंगों को केवल चेहरे पर नहीं, हृदय में बसाइए। शब्दों से नहीं, भावों से जोड़िए। किसी के जीवन में आशा का रंग घोलिए, क्योंकि रंग कभी बेरंग नहीं होते; वे तभी फीके पड़ते हैं जब मन का जल सूख जाता है।
इसलिए होली दिल से खेलें… चालाकी से नहीं, ताकि रंगों के साथ-साथ मानवता भी उज्ज्वल बनी रहे और जीवन सचमुच प्रेम के जल में घुलकर रंगीन हो उठे।
रचयिता की कलम के और रंग
सृजक
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति







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