सुनिता मीणा की लेखनी
एक और प्रहार
एक और प्रहार, जो असहनीय हो रहा बार-बार
आज फिर एक दुर्घटना सुनी
दिल रो रहा है, चीख रहा है यह सब सुनकर
मैं वहां क्यों नहीं थी?
क्यों नहीं रोक पाई उन दरिंदों को
उन लोभी ,लालची दानवों को
जो बने हैं खून के प्यासे
कितनों की जान लेंगे, कितनों की कुर्बानी?
क्या इन पिपासुओं में हृदय भी है या नहीं?
आखिर चाहिए क्या इन्हें?
इतनी हत्याएं करके
इतनों की दुनिया उजाड़ कर
कागज के टुकड़े या ज़मी का टुकड़ा ?
पर करेंगे क्या ये इनका?
मरने पर तो साथ नहीं ले जाएंगे इन्हें
जहां से पाया, वही छूट जाएगा सब
फिर भी क्यों समझ नहीं आता इन्हें?
एम्पथी, सिंपैथी पढ़ने वाले ही करवा रहे हैं यह सब
यही सब करना था तो क्यों आडंबर का चोला ओढ़ा?
बहुत ही केस स्टडी हल की कागजों में
बात जब धरातल की आई तो वही ढाक के तीन पात
चोर चोर मौसेरे भाई
प्रशासक और राजनेता
धिक्कार है तुम्हारे पद, योग्यता पर
और लानत है तुम्हारे दिखावे ज्ञान पर
कहते हैं एक सत्ताधारी अपने क्षेत्र की तस्वीर बदल सकता है
तस्वीर तो यहां की भी बदल रही है
पर अनचाहे रूप में
मैं तो कहती हूं कर दो कुर्बान खुद को
यदि बात जीवन दाता के जीवन की हो तो
क्या करेंगे इस जीवन का जो उनके ही काम ना आए?
वादे करते हैं बड़े-बड़े विकास के
विकास नहीं सर्वनाश है ये
अरे, किसी का अच्छा न करो तो, बुरा तो मत करो
किसी को हंसा न सको तो, आंसू तो मत दो
धरा को बचा न सको तो उसे नोचें तो मत
पेड़ न लगा सको तो, काटो तो मत
विकास के नाम पर क्यों तहस-नस मचा रहे हो?
पेड़ को न काटने के तो कई विकल्प हो सकते हैं
लेकिन पेड़ कोकाट कर उसका कोई विकल्प नहीं ढूंढ सकते
यह कब समझ में आएगा तुमको
जब बात आपे बाहर हो जाएगी तब?
जब एक-एक प्राणी का दम घुटेगा तब?
धरा चीख चीख कर कहेगी तब?
या प्रलय में सब कुछ धूमिल हो जाएगा तब?
मन की व्यथा
जब जब ऐसा होता है
ये जीवन ही निरर्थक लगता है
बोझ है हम धरा पर
जो मदद न कर सके बेजुबानों की
असहाय, कमजोरों की
रोना आता है ऐसी जिंदगी पर
जिंदगी दी भी तो ऐसे बंधनों के साथ
सब कुछ छोड़ना चाहता है मन
फिर भी पार नहीं कर पाता ये बंधन
कितने दुखदाई और बोझिल लगते हैं ये रिश्ते?
जब किसी को बचाने में ही बनते हैं बाधक
दिल पूर्णतः निष्काम, निस्वार्थ होकर
बचाना चाहता है उन सब प्रताड़ितो को
पर ये सांसारिक रिश्ते, कहने को अपने
ये ही पीछे खींच लेते हैं
क्यों नहीं खुली छूट दे देते कि 'जाओ '
तुम 'आज़ाद' दूसरों को भी आजाद करो
किसी की आवाज बनो, तो किसी का सहारा
अकेले के तो तुम बनो साथी, प्रकृति के पुजारी भी
बढ़ाओ किसी का हौसला, तो बनो किसी की मुस्कान
और फिर बंधनों में बंध कर छटपटाने के अलावा कोई रास्ता नहीं
एक संवेदनशील के पास
कागज और कलम ही उसका सहारा
आंखों में आंसू बहा कर
भावों का गुबार उकेर कर
शांत कर लेता है अपने उद्वेलित मन को
उसे दग़्ध, व्यथित मन को
जो न्याय के लिए सैंकड़ों से लड़ने की ताकत रखता है
समझदार लोगों की संख्या तो ज्यादा है यहां
सब यही शिक्षा देंगे
भावनाओं में ना बहो
भावनाएं नहीं पेट नहीं भरती
घर नहीं चलाती,आराम नहीं देती
ऐसी व्यथा के साथ भी कहां आराम?
आंखों में सदैव ही नीर, मन में तड़प, बेचैनी
बाहरी रूप में यह सुख हो सकता है
लेकिन अंदर तो द्वागनल के समान
कितनी ही बार मन हुआ तीव्रता के साथ
छोड़ो, काटो सब पासों को
चलो उसे दुनिया में, जज हमारी जरूरत है
जहां इस आत्मा को सुख है, संतोष है, तृप्ति है
बहुत ताकत जुटानी पड़ेगी उस आजादी के लिए
बहुत संघर्ष करना पड़ेगा इन बेड़ियों को हटाने के लिए
मन में हौसला है, उम्मीद है
एक दिन ऐसा आएगा
यह पंछी पिंजरे से आजाद हो जाएगा।
रचनाकार
सुनिता मीना
उप प्राचार्य
राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय मानटाउन सवाई माधोपुर
(राज.)



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