होली के भाव जो एक ही कलम से आए
✨कान्हा की बरजोरी ✨
ब्रज की होली स्वयं में केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भाव, भक्ति और लोकजीवन का जीवंत उत्सव है। वृंदावन और मथुरा के निकट स्थित ब्रज क्षेत्र में मनाई जाने वाली होली का संबंध सीधे भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से है। यहाँ की होली अनगिनत रंगों, लजीज पकवानों, सदियों पुरानी परंपराओं और अलौकिक उल्लास से सराबोर रहती है।
ब्रज की होली केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और आत्मीयता का महोत्सव है। लोग एक-दूसरे के गले मिलते हैं, अबीर-गुलाल लगाते हैं और प्रेम, आस्था तथा विश्वास का भाव प्रकट करते हैं। परिवारजन स्वादिष्ट एवं सुरुचिपूर्ण व्यंजनों का आनंद लेते हैं। पूरा गाँव फाग-गायन, ढोल-मंजीरों की मधुर ध्वनि और हर्षोल्लास से झूम उठता है। नर-नारी, बाल-वृद्ध सभी इस आनंद में सराबोर हो जाते हैं। भारतीय पर्व केवल सांस्कृतिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और वैज्ञानिक आधार पर भी संतुलित एवं सार्थक सिद्ध होते हैं—होली ऋतु परिवर्तन के समय उत्साह, स्वच्छता और सामूहिक मेलजोल का संदेश देती है।
ब्रज की होली विशेष रूप से प्रसिद्ध है। बरसाना की महिलाएँ परंपरा के अनुसार नंदगाँव जाकर होली का न्यौता देती हैं, और तब आरंभ होती है प्रसिद्ध लठमार होली। यह उत्सव धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में रंग जमाता हुआ मुख्य पर्व तक पहुँचता है। उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र में मनाया जाने वाला यह उत्सव देश-विदेश के श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है। यह महोत्सव श्रीकृष्ण के जीवन और उनकी रास-लीलाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।
✨ होली गीत एक✨
छोड़ो कान्हा, मैं तुझसे हारी,
तुझसे हारी, मैं भीगी सारी।
ना मारो मोहे भर पिचकारी,
छोड़ो कान्हा, मैं तुझसे हारी।
तुझे न सूझे जग की दारी,
क्यों मैं हो गई तुझ पर वारी।
ना छेड़ो मोहे, दूँगी गारी,
कैसा तू है भोला-अनाड़ी!
छोड़ो कान्हा, मैं तुझसे हारी।
यूँ पीछे आए बन शिकारी,
कर दूँगी मैं शिकायत सारी।
रंग डाले तन-मन की क्यारी,
बस गई छवि तेरी मन मंझारी।
छोड़ो कान्हा, मैं तुझसे हारी।
तुझसे हारी, मैं भीगी सारी,
ना मारो मोहे भर पिचकारी।
प्रेम-रंग में डूबी नारी,
छोड़ो कान्हा, मैं तुझसे हारी।
यह गीत राधा-कृष्ण के मधुर प्रेम और होली की चंचल छेड़छाड़ का सजीव चित्र प्रस्तुत करता है—जहाँ मान, उलाहना, स्नेह और समर्पण सब रंगों की तरह एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं।
✨ होली गीत दो✨
सखी होली में धूम मचाए,
महीना आया फागुन का,
सखी झूम झूम नाचे मनवा,
महीना आया फागुन का,
हरे हरे खेतों में, पीली, पीली सरसों,
टेसु का रंग नहीं छूटे,
महीना आया फागुन का,
आज़ धरती का नूतन श्रंगार,
महीना आया फागुन का,
कान्हा के हाथ कनक पिचकारी,
राधा के हाथों में, रंगों की थाली,
कान्हा होली में धूम मचाए,
महीना आया फागुन का,
अबीर गुलाल की धूम मची है,
बृज, में रंगों की बौछार पड़ी है,
तन, मन रंग गयो श्याम,
महीना आया फागुन का,
महीना आया फागुन का।
🌹।। रंग ही रंग।। होली के🌹
गूगल से साभारआया होली का त्योहार,
उड़े रंगों की फुहार।
झूमे धरती आकाश।
माथे पे सोहे मुकुट, बड़ा।
जिसमें माणिक्य है जड़ा।
गले में फूलों के हार,
प्यारा लगे है श्रंगार।
मनभावन त्योहार।
उमड़ी ग्वालों की टोली,
सखियाँ बोलें रस की बोली।
हिल-मिल नाचें दे-दे ताल ,
गालों पे मलते हैं गुलाल।
बाजे ढोल झांझ मंजीरा,
मिल गावत आज कबीरा।
ऐसी छाई है गुलाल ,
धरती अम्बर हो गये नीले-लाल।
खड़े नर-नारी हैं द्वार,
करते हैं जय-जय कार।
बृज की है होली, आज
मन मोहे युगल सरकार,
जय श्री कृष्णा।
प्रमिला त्रिवेदी।



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