रंग बरसे

 रंग बरसे

भूमिका

वसंत की देहरी पर खड़ा फाल्गुन जब अपने रंगों की पोटली खोलता है, तब प्रकृति स्वयं एक उत्सव बन जाती है। यह वह क्षण होता है जब आकाश केवल बादलों से नहीं, भावों से भर जाता है; जब धरती केवल फूलों से नहीं, उमंगों से सज जाती है। मन के भीतर दबे हुए संकोच, शिकायतें और दूरियाँ सब धुलने लगती हैं।

इसी अलौकिक वातावरण में रची गईं आदरणीया विजया डालमिया जी की ये पंक्तियाँ होली के उत्सव को केवल एक पर्व के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के मुक्त नृत्य के रूप में प्रस्तुत करती हैं। यहाँ रंग केवल गुलाल नहीं, भावनाओं का प्रस्फुटन है; चंग और ढोल केवल वाद्य नहीं, हृदय की धड़कनों का उत्साह है। कान्हा बनकर नाचता मन, सखियों-सी चंचल होती संवेदनाएँ, और बिना डोर उड़ती पतंग-सा दिल—ये सब मिलकर उस उन्मुक्त आनंद का चित्र खींचते हैं, जहाँ सीमाएँ स्वयं मिट जाती हैं।

इन पंक्तियों में होली का हुड़दंग भी है, प्रीत की मलंगता भी है, और जीवन को बेढंग होकर जी लेने की निर्भीकता भी। यह कविता हमें याद दिलाती है कि कभी-कभी जीवन को नियमों से नहीं, रंगों से समझना चाहिए।

आइए, इन पंक्तियों के माध्यम से उस भावलोक में प्रवेश करें जहाँ आज सचमुच आकाश से रंग बरस रहे हैं

… 🌈

रंग बरसे

आज तो आकाश से बरस रहा रंग है।

ढोल नगाड़े संग बज रहा चंग है 

नाचे मने कान्हा बन सखियों के संग है।

लाल और गुलाल की बहार लिए अंग है।

मतवाली चाल हुई बिना पिए भंग है। 

बिना डोर उड़ रहा दिल बना पतंग है।

कोई सीधे चले ना सब बे ढंग है ।

प्रीत के रंग में हर कोई मलंग है।

मस्ती में डूबे सभी होली का हुड़दंग है।

आज तो आकाश से बरस रहा रंग है।

रचनाकार

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 






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