।।आँसू।।
।।आँसू।।
भूमिका
संवेदनाएँ जब शब्दों से आगे बढ़ जाती हैं, तब वे आँसू बनकर आँखों से झलकती हैं। आदरणीया प्रमिला त्रिवेदी जी की यह रचना ‘आँसू’ उसी मानवीय भाव–जगत की सहज और मार्मिक अभिव्यक्ति है।
इस कविता में आँसू केवल दु:ख का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे मन के सच्चे साथी के रूप में उभरते हैं। जब अपने साथ छोड़ देते हैं, तब यही आँसू सहारा बनते हैं। जब हृदय पीड़ा से झुलसता है, तब यही उसे शीतलता प्रदान करते हैं। कभी माँ के भरोसे जैसे, तो कभी हमसफ़र की तरह—ये आँसू मन की हर स्थिति में साथ निभाते हैं।
रचना का सौंदर्य इस बात में है कि कवयित्री ने आँसुओं को कमजोरी नहीं माना, बल्कि उन्हें मन की शक्ति, शुद्धि और सच्चाई का प्रतीक बताया है। वे बिना बोले बहुत कुछ कह देते हैं और हृदय का बोझ हल्का कर देते हैं। चाहे समर्पण का क्षण हो, तर्पण का अवसर हो या फिर अपार खुशी का समय—हर भाव में आँसू अपनी अलग भूमिका निभाते हैं।
सरल शब्दों में कही गई यह कविता हमें यह सिखाती है कि आँसू जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। वे हमारे भीतर के सच्चे भावों का दर्पण हैं—कभी दर्द, कभी प्रेम और कभी अपार आनंद का।
यह रचना पाठकों को अपनी संवेदनाओं से जुड़ने और उन्हें स्वीकार करने की प्रेरणा देती है।
।। आँसू।।
मुसीबत में जब घिरा मन,
सहारा बन गये आंसू,
चलें गये जब चाहने वाले,
हमारे बन गए आंसू,
झुलसते दिल की पीड़ा को,
समझ कर एक ही पल में,
बुझाने चल पड़े उठ कर,
मेरे वो हम सफ़र आंसू,
जहां तन्हा हूआ ये दिल,बस
अकेले में या महफ़िल में,
लरज कर दिल को छूने को,
चलें आते है ये आंसू,
कहीं भी दर्द कैसा भी,
कभी भी जब उठे दिल में,
भरोसा मां के जैसा दे,
दवा खुद बन गए आंसू,
नयन की शुद्धि इनसे ही,
नयन प्रतिबिंबित है सब के,
बीना बोले बताते सब,
बड़े वाचाल है आंसू,
रोज अच्छे नही लगते ये आंसू,
समर्पण हो या तर्पण हो,
भरे अनुराग मन में हो,
खुशी के रंग भरते है,
बह जाते है ये आंसू।
रचनाकार






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