तपना पड़ता है! - लालबहार

 तपना पड़ता है! 

भूमिका 

मानव जीवन के सूक्ष्म अनुभवों को यदि कुछ पंक्तियों में समेटना हो, तो वे पंक्तियाँ केवल शब्द नहीं रह जातीं, बल्कि आत्मचिंतन का दर्पण बन जाती हैं। श्री लाल बहार जी की प्रस्तुत पंक्तियाँ भी इसी श्रेणी की हैं, जहाँ जीवन के साधारण प्रतीत होने वाले व्यवहारों के पीछे छिपी असाधारण साधना को उजागर किया गया है।

इन पंक्तियों का मूल भाव यह है कि नकारात्मकता सहज है, जबकि सकारात्मकता साधना है। अपमान करना, बोल देना, दुखी हो जाना या बुरा कर देना — ये सब प्रतिक्रियाएँ सहज प्रवृत्ति से उपजती हैं; इनमें किसी आंतरिक अनुशासन की आवश्यकता नहीं होती। किंतु अपमान सहना, संयमित मौन रखना, परिस्थितियों में प्रसन्न रहना और भलाई करना — ये सभी ऐसे कर्म हैं जो भीतर की तपस्या, धैर्य और आत्मसंयम की माँग करते हैं।

यह रचना मनुष्य के भीतर चलने वाले द्वंद्व को भी अत्यंत सरल भाषा में अभिव्यक्त करती है। यह संकेत देती है कि बाहरी संसार से संघर्ष करने से अधिक कठिन है स्वयं को साधना। प्रतिक्रिया देना सहज है, पर प्रतिक्रिया पर नियंत्रण रखना तप है। इसी कारण कवि ने “तपना” शब्द का प्रयोग केवल कष्ट के अर्थ में नहीं, बल्कि आत्मपरिष्कार की प्रक्रिया के रूप में किया है।

वस्तुतः इन पंक्तियों को जीवन-दर्शन की भूमिका के रूप में देखा जा सकता है, जहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि श्रेष्ठ आचरण किसी तात्कालिक आवेग का परिणाम नहीं, बल्कि दीर्घकालिक साधना का फल होता है। भलाई, धैर्य, मौन, सहनशीलता और प्रसन्नता — ये सभी गुण बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि भीतर के तप से जन्म लेते हैं।

अतः यह काव्यांश हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि जीवन की वास्तविक ऊँचाई सुविधा में नहीं, बल्कि संयम और सहनशीलता की अग्नि में तपकर प्राप्त होती है। जो व्यक्ति इस तप की प्रक्रिया को स्वीकार करता है, वही परिस्थितियों से ऊपर उठकर मानवीय मूल्यों को जीवित रख पाता है। यही इन पंक्तियों का सार है और यही उनका स्पष्टीकरण भी — कि अच्छा बनना सहज नहीं, बल्कि निरंतर तप का परिणाम है। 

तपना पड़ता है

कुछ नहीं करना पड़ता 

अपमान करने के लिए 

अपमान सहने के लिए 

तपना पड़ता है।


कुछ नहीं करना पड़ता

बोलने के लिए 

चुप रहने के लिए

तपना पड़ता है।


कुछ नहीं करना पड़ता

दु:खी होने के लिए

खुश रहने के लिए 

तपना पड़ता है। 


कुछ नहीं करना पड़ता 

बुरा करने के लिए 

भला करने के लिए 

तपना पड़ता है।

रचनाकार

 
श्री लालबहार जी
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 








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