प्रधानाचार्य प्रवेंद्र दहिया का चिंतन-बिंदु

बच्चों में मोबाइल एडिक्शन पर नियंत्रण की दिशा में एक आवश्यक पहल

आज के समय में बच्चों में बढ़ती मोबाइल निर्भरता केवल एक तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर सामाजिक और पारिवारिक चुनौती बन चुकी है। विद्यालय के प्रधानाचार्य के रूप में मैं प्रतिदिन बच्चों के व्यवहार, उनकी एकाग्रता, धैर्य और भावनात्मक संतुलन में आ रहे बदलावों को निकट से देखता हूँ। यही अनुभव मेरे मन में एक गहरी चिंता का कारण बना और इसी चिंतन ने “संस्कार एवं परवरिश की पाठशाला” कार्यशाला के आयोजन का निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया।

मैंने पाया कि अनेक बच्चे कक्षा में ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहे हैं, शीघ्र चिड़चिड़े हो जाते हैं, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करते हैं तथा धैर्य की कमी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। जब इस व्यवहार के कारणों को समझने का प्रयास किया गया, तो एक प्रमुख कारण अत्यधिक मोबाइल उपयोग सामने आया। मोबाइल बच्चों के लिए केवल मनोरंजन का साधन नहीं रह गया है, बल्कि वह उनके समय, सोच और स्वभाव को प्रभावित करने वाला माध्यम बन गया है।

मेरा यह दृढ़ मानना है कि मोबाइल एडिक्शन को केवल प्रतिबंध लगाकर नियंत्रित नहीं किया जा सकता; इसके लिए जागरूक परवरिश, पारिवारिक संवाद और संतुलित दिनचर्या आवश्यक है। बच्चे वही सीखते हैं जो वे घर और विद्यालय के वातावरण में देखते हैं। यदि माता-पिता स्वयं मोबाइल के अत्यधिक उपयोग में लिप्त रहते हैं, तो बच्चों से संयम की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं है। इसलिए नियंत्रण की शुरुआत वयस्कों के आत्म-अनुशासन से होनी चाहिए।

मेरे चिंतन का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि बच्चों के जीवन के प्रारंभिक वर्षों में भावनात्मक जुड़ाव और संवाद की अत्यधिक आवश्यकता होती है। जब उन्हें समय, स्नेह और संवाद के स्थान पर मोबाइल दिया जाता है, तो वह धीरे-धीरे उनकी आदत और फिर निर्भरता में परिवर्तित हो जाता है। इस स्थिति में मोबाइल एक “डिजिटल बेबीसिटर” बन जाता है, जो अस्थायी शांति तो देता है, परंतु दीर्घकाल में बच्चों के व्यक्तित्व विकास को प्रभावित करता है।

इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए मैंने यह निर्णय लिया कि समस्या का समाधान केवल बच्चों को समझाने से नहीं, बल्कि अभिभावकों को जागरूक करने से संभव है। इसलिए “संस्कार एवं परवरिश की पाठशाला” विषय पर कार्यशाला आयोजित करने का उद्देश्य यही था कि अभिभावक मोबाइल के प्रभाव, बच्चों के मस्तिष्क विकास और व्यवहारिक परिवर्तनों के वैज्ञानिक पक्ष को समझ सकें।

मोबाइल एडिक्शन पर नियंत्रण के लिए मेरा स्पष्ट दृष्टिकोण है कि घरों में “टेक-फ्री समय” और “टेक-फ्री जोन” बनाए जाएँ, बच्चों को आउटडोर खेल, पुस्तक पठन, रचनात्मक गतिविधियों और पारिवारिक संवाद से जोड़ा जाए, तथा बच्चों के गुस्से और जिद्द को दमन के बजाय समझ के साथ संभाला जाए। बच्चों को व्यस्त रखने के लिए मोबाइल देना आसान उपाय है, परंतु यह स्थायी समाधान नहीं है।

अंततः, मैंने इस कार्यशाला को केवल एक कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि एक जागरूकता अभियान के रूप में देखा। मेरा विश्वास है कि जब विद्यालय और अभिभावक मिलकर बच्चों के मानसिक, भावनात्मक और नैतिक विकास की जिम्मेदारी साझा करेंगे, तभी मोबाइल एडिक्शन जैसी समस्या पर प्रभावी नियंत्रण संभव होगा। बच्चों को मोबाइल से दूर करना लक्ष्य नहीं है, बल्कि उन्हें संतुलित, संवेदनशील और संस्कारित जीवन की ओर प्रेरित करना ही इस पहल का मूल उद्देश्य है।

चिंतन बिंदु का मूर्त रूप






सूचना स्रोत
श्री प्रवेंद्र दहिया जी

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 






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