अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस : इसके मूल भाव को समझना
अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस
इसके मूल भाव को समझना
मातृभाषा वह भाषा है, जिसमें हम सबसे पहले दुनिया को पहचानते हैं, भावों को समझते हैं और अपनेपन का अनुभव करते हैं। यह केवल बोलने का माध्यम नहीं, बल्कि हमारे संस्कार, संस्कृति और संवेदनाओं की जड़ है। इसलिए जब ‘अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ का विचार सामने आया, तो उसके पीछे केवल एक दिवस मनाने की औपचारिकता नहीं, बल्कि एक गहरी मानवीय भावना रही होगी।
दरअसल, इस दिवस की कल्पना का मूल भाव यह है कि दुनिया की हर भाषा अपने साथ एक संस्कृति, एक इतिहास और एक जीवन-दृष्टि लेकर चलती है। यदि कोई भाषा समाप्त होती है, तो उसके साथ उस समाज की स्मृतियाँ, परंपराएँ और अनुभव भी धीरे-धीरे खोने लगते हैं। इसलिए इस दिवस को विकसित करने वालों की सोच संभवतः यही रही होगी कि लोग अपनी मातृभाषा के महत्व को समझें, उसे सम्मान दें और उसे जीवित रखें।
यह दिवस हमें यह भी समझाता है कि भाषा का संबंध केवल शब्दों से नहीं, बल्कि आत्मसम्मान से होता है। मनुष्य अपनी मातृभाषा में सबसे सहज होकर सोचता है, सीखता है और अपने मन की बात कह पाता है। इसी से उसका आत्मविश्वास बढ़ता है और व्यक्तित्व स्वाभाविक रूप से विकसित होता है।
आज के वैश्विक समय में अनेक भाषाएँ लुप्त होने के कगार पर हैं। नई पीढ़ी का अन्य भाषाओं की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक है, परंतु यदि इस प्रक्रिया में मातृभाषा पीछे छूट जाए, तो यह सांस्कृतिक कमजोरी का संकेत बन सकता है। इसलिए इस दिवस का वास्तविक उद्देश्य यह याद दिलाना है कि नई भाषाएँ सीखना प्रगति है, पर अपनी मातृभाषा को भूल जाना प्रगति नहीं है।
विशेषकर भारत जैसे बहुभाषी देश में मातृभाषा का महत्व और भी अधिक है। यहाँ भाषाएँ केवल संप्रेषण का साधन नहीं, बल्कि लोकजीवन की आत्मा हैं। घर, परिवार और विद्यालय यदि मातृभाषा को स्थान देते हैं, तो भाषाई विविधता स्वाभाविक रूप से सुरक्षित रहती है।
अतः ‘अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस’ का मूल संदेश यही है कि यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि चेतना का दिवस है। यह हमें याद दिलाता है कि अपनी मातृभाषा से जुड़ना अपनी जड़ों से जुड़ना है। जब हम अपनी भाषा को अपनाते हैं, तो हम अपनी संस्कृति, संवेदना और पहचान को भी सुरक्षित रखते हैं।
सरल शब्दों में कहें तो इस दिवस को मनाने का वास्तविक उद्देश्य समारोह करना नहीं, बल्कि यह समझना है कि मातृभाषा हमारे अस्तित्व का आधार है। यदि भाषा सुरक्षित है, तो संस्कृति सुरक्षित है; और यदि संस्कृति सुरक्षित है, तो समाज की आत्मा भी सुरक्षित रहती है।
सृजक






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