जानते भी हो प्रेम क्या है?
प्रस्तावना
प्रेम—एक ऐसा शब्द, जिसे हमने जितना सुना है उससे कहीं कम जिया है, और जितना समझा है उससे कहीं अधिक भ्रमित किया है। प्रमिला त्रिवेदी जी की यह कविता प्रेम के उसी शुद्ध स्वरूप को स्पर्श करती है, जो प्रदर्शन में नहीं, बल्कि व्यवहार की सूक्ष्म संवेदनाओं में बसता है। यहाँ प्रेम कोई दैहिक आकर्षण या औपचारिक संबंध नहीं, बल्कि समय की उदारता, मन की सजलता और हृदय की करुणा का सहज विस्तार बनकर उभरता है।
कविता यह संकेत देती है कि प्रेम किसी बंधन का मोहताज नहीं होता; वह किसी नाम, संबंध या अपेक्षा से परे एक मानवीय अनुभूति है। किसी की व्यथा को सुन लेना, किसी के आँसुओं को चुपचाप सहला देना, टूटे मन पर मधुर शब्दों का मरहम रख देना, और सबसे बढ़कर—किसी उपेक्षित या निर्धन को सम्मान का एहसास कराना—ये सब प्रेम के वे रूप हैं जो शोर नहीं करते, पर आत्मा को गहराई से छू जाते हैं।
आज के समय में, जब प्रेम को अक्सर संकीर्ण परिभाषाओं और संदेह की दृष्टि से देखा जाता है, यह कविता हमें उसके वास्तविक, पवित्र और मानवीय अर्थ की ओर लौटने का निमंत्रण देती है। यह बताती है कि सच्चा प्रेम किसी विशेष अधिकार का विषय नहीं, बल्कि संवेदना की वह धारा है जो हर हृदय में समान रूप से प्रवाहित हो सकती है।
प्रमिला त्रिवेदी जी की यह रचना हमें याद दिलाती है कि परमात्मा के बाद यदि संसार में कोई सबसे निर्मल तत्व है, तो वह प्रेम ही है—निस्वार्थ, निष्कलुष और करुणा से परिपूर्ण। यह कविता न केवल प्रेम की पुनर्परिभाषा करती है, बल्कि पाठक के भीतर सोई हुई संवेदनाओं को भी जाग्रत कर देती है, ताकि हम प्रेम को समझने के बजाय उसे जीना सीख सकें।
जानते भी हो प्रेम क्या है?
अपने वक्त के कीमती लम्हे
किसी को देना
किसी की सुन लेना
किसी की आँख से
आँसुओं को चुन लेना
किसी के दिल के ज़ख्मों पर
मीथा बोल के मरहम लगा देना
किसी निर्धन को इज्जत का एहसास देना
बिना किसी रिश्ते के बिना किसी संबंध के
किसी के दर्दका एहसास होना
यही तो प्रेम है
बस हम लोगों ने इसे
पढ़ा और समझा ही गलत तरीके से है
इसलिए आज भी सच्चे प्रेम को
गलत नज़रों से देख लिया जाता है
परमात्मा के बाद अगर दुनिया में
कोई पवित्र चीज है
तो वो है प्रेम
सृजक
श्रीमती प्रमिला त्रिवेदी
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति





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