सूना आँगन, सिमटते रिश्ते और बदलती पीढ़ी की सोच…

सूना आँगन, सिमटते रिश्ते और बदलती पीढ़ी की सोच…

"मेरे घर-आँगन में उतरा चाँद, खेले उसके संग चाँदनी,

बच्चों की किलकारी से गूँजित हर पल खुशियों की रागिनी।"

कोई तीस साल पहले तक हम रिश्तों में जीते थे—ऐसे रिश्ते, जो परिवार और बच्चों को सुरक्षा, संस्कार और स्नेह से परिपूर्ण परवरिश देते थे। रिश्तों की बगिया में जैसे ही कोई फूल खिलता, सभी खुशी से नाचने-गाने लगते थे और तैयारियों में जुट जाते थे। उसी तरह, जब घर में बुआ, दीदी या मौसी आने वाली होती थीं, तो बच्चों की फौज उनके इंतज़ार में लग जाती थी। उँगलियों पर दिन गिनना शुरू हो जाता था कि… वे कब आएँगी।

पर आज न बच्चों की वह फौज है, न ही वह उत्सुक प्रतीक्षा। आखिर ऐसी क्या वजह है कि रिश्ते इस तरह एकाकी होकर सिमट गए? आज घर में बच्चे के आने की खुशी से अधिक तनाव दिखाई देता है, जबकि माँ बनना सबसे सुखद और परम एहसास है। मातृत्व का सुख पाकर हर नारी स्वयं को संपूर्ण महसूस करती है। ईश्वर ने ममता का पर्याय ही माँ को बनाया है; मातृत्व सुख अतुलनीय है।

जब हम पहली बार बच्चे की धड़कन सुनते हैं या उसे गोद में लेते हैं, तो एक ही पल में हमारी दुनिया बदल जाती है। यह सुखद अनुभूति कि… यह सिर्फ और सिर्फ हमारा है—शब्दों में व्यक्त ही नहीं की जा सकती। आँखों में उमड़ते आँसू भी खुशी से झूम उठते हैं। यह पहला अनुभव जीवनभर नहीं भूलता और यहीं से नन्हे-मुन्ने के साथ जीवन-यात्रा की एक नई शुरुआत होती है।

इतना सुखद एहसास होने के बावजूद आज की युवा पीढ़ी इसकी अहमियत को क्यों नहीं समझ पा रही? क्यों सबकी दुनिया “हम दो, हमारे दो” से सिमटकर “हम दो और हमारा एक” या कहीं-कहीं तो “एक भी नहीं” तक सीमित होती जा रही है?

बच्चा अर्थात बंधन—पर यह बंधन प्रेम को और अधिक मज़बूती प्रदान करता है। बच्चे का पालन-पोषण आसान नहीं, बल्कि अत्यंत बड़ी जिम्मेदारी है। यही कारण है कि आज की युवा पीढ़ी इस जिम्मेदारी को लेने से कतराती है। सबसे बड़ी वजह यह है कि पति-पत्नी दोनों नौकरी करते हैं, परिवार से दूर अकेले रहते हैं और उन्हें लगता है कि बच्चे के आने से उनकी स्वतंत्रता में बाधा आएगी।

दरअसल, आज की पीढ़ी के जीवन की शुरुआत ही देर से होती है—पहले पढ़ाई, फिर करियर; इसी पर अधिक ध्यान केंद्रित रहने से उम्र बढ़ती जाती है। देर से विवाह होने के कारण संतानोत्पत्ति में भी जटिलताएँ आने लगती हैं। पहले की स्त्रियाँ अधिक शारीरिक श्रम करती थीं, जिससे सामान्य प्रसव की संभावना अधिक रहती थी; परंतु आज शारीरिक श्रम कम होने के कारण सामान्य प्रसव भी कम होते जा रहे हैं। एक कुदरती करिश्मा, जिसके लिए ईश्वर ने नारी को चुना है, उसे महसूस करने से कई बार वह वंचित रह जाती है। प्रसव की जटिलताओं को देखते हुए एक बच्चे के बाद दूसरे बच्चे के लिए जोखिम लेने से लोग बचते हैं।

आजकल यह तर्क भी अधिक सुनने को मिलता है कि बच्चों पर खर्च बहुत अधिक है। पर क्या हमारे बुज़ुर्गों ने हमारी परवरिश में कोई कमी रखी थी? महँगाई तब भी थी, आज भी है; कमाई तब भी थी, आज भी है। हाँ, आज शिक्षा अवश्य महँगी हो गई है, क्योंकि प्रतिस्पर्धा के दौर में हर किसी की महत्वाकांक्षा बच्चों से जुड़ गई है। बच्चों का बचपन छीनकर उन्हें भी दौड़ में शामिल कर लिया गया है।

मैं मानती हूँ कि बच्चे का पालन करने के लिए तन, मन और धन—तीनों की आवश्यकता होती है। पर हर बच्चा अपनी तकदीर लेकर जन्म लेता है। उसके कदम पड़ते ही जीवन में बरकत और खुशियों की वर्षा होने लगती है। साथ ही दिनचर्या सुधर जाती है और व्यक्ति पहले से अधिक जिम्मेदार एवं व्यवस्थित हो जाता है। बच्चे ईश्वर का वह अनुपम उपहार हैं, जो जीवन को नई रोशनी से भर देते हैं और वंश को आगे बढ़ाते हैं।

लिव-इन रिलेशनशिप भी कहीं न कहीं घटती प्रजनन दर का एक कारण बनती जा रही है। इसमें युवा पीढ़ी अपनी व्यक्तिगत खुशियाँ तलाशती है और बच्चों की जिम्मेदारी से बचना चाहती है। जब मैंने युवाओं से इस विषय पर बात की, तो उनके उत्तर सुनकर मन द्रवित हो गया। कई युवाओं ने बताया कि उन्होंने अपने माता-पिता को हमेशा झगड़ते हुए देखा है; इसी कारण वे विवाह के बंधन में बँधना नहीं चाहते, और यदि बँधते भी हैं, तो बच्चे को इस दुनिया में लाना नहीं चाहते, ताकि वह भी उसी मानसिक पीड़ा से न गुज़रे जिससे वे गुज़र चुके हैं।

एकल परिवार के बच्चे अक्सर अकेले रहना पसंद करते हैं। उन्हें निजता प्रिय होती है; वे अपनी बातों को साझा नहीं करते और छोटी-छोटी बातों पर अवसाद में चले जाते हैं, क्योंकि वे अकेले होते हैं। यदि उनके हमउम्र भाई-बहन होते, तो वे आपस में अपने मन की बातें साझा कर पाते।

पहले संयुक्त परिवार होते थे। घर में इतने बच्चे होते थे कि कहीं और जाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी। आपस में ही बहुत कुछ सीख लिया जाता था—मिल-बाँटकर खाना, खेलना, सहनशीलता और समस्याओं से स्वयं निपटना। सभी रिश्तों की पहचान सहज हो जाती थी। सबसे बड़ी बात—“तेरा-मेरा” कुछ नहीं, सब “हमारा” होता था। ममता और समझौते का भाव लिए सब बड़े होते थे और यही संस्कार जीवन का हिस्सा बन जाते थे।

आज स्थिति यह है कि यदि घर में कोई रिश्तेदार आ जाए, तो उसे अतिरिक्त समझकर बच्चे उनसे जुड़ नहीं पाते। यह हमारी आधुनिक जीवन-शैली का ही परिणाम है। बहुत कम घरों में अब किसी के आने पर बच्चों की मासूम किलकारियाँ सुनाई देती हैं। यदि यही स्थिति रही, तो भविष्य में मामा, मासी, बुआ, फूफा, बहन और भाई जैसे रिश्ते केवल कहानियों तक सीमित रह जाएँगे। कौन कहेगा—“दिन में कहानी मत सुनो, वरना मामा रास्ता भूल जाएगा।”

समाज की घटती जनसंख्या के दुष्परिणामों को रोकने के लिए विभिन्न समुदायों द्वारा प्रोत्साहन के प्रयास भी किए जा रहे हैं। एक समय था जब बढ़ती जनसंख्या को रोकने के लिए योजनाएँ बनाई जाती थीं, और आज घटती जनसंख्या चिंता का विषय बनती जा रही है।

अब कहाँ वह घर का आँगन? आँगन में भागते-दौड़ते बच्चों की किलकारियाँ, रेलगाड़ी के डिब्बे बनकर खेलते बच्चे—सब जैसे लुप्त हो गए हैं। बच्चे देश का भविष्य होते हैं; यदि बच्चे ही न हों, तो किसी भी देश का भविष्य संकट में पड़ सकता है। आवश्यकता है कि हम पुनः सचेत हों। मरते रिश्तों को बचाना होगा, और परिवारों में स्नेह, संवाद तथा संतुलन को पुनर्जीवित करना होगा।

अंत में बस इतना ही—
दो बच्चों से कम नहीं,
तीन भी हों तो ग़म नहीं।

सूचना स्रोत

श्रीमती प्रमिला त्रिवेदी
स्थानीय संपादिका 
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
हैदराबाद

रचनाकार

विजया डालमिया

संपादिका, 

            मेरी निहारिका (मासिक ई-पत्रिका)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 







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