कच्चे घर, पक्के रिश्ते… और! आज का सिमटता जीवन!
कच्चे घर, पक्के रिश्ते…
और! आज का सिमटता जीवन!
ना वो आँगन… ना ही तिरपाल। घर-घर में गूँजती हँसी की खनक कहाँ चली गई…? ये कहाँ आ गए हम? मसालों की मिली-जुली घर-सी खुशबू कहाँ खो गई?
हमारी पुरानी परंपराएँ याद आती हैं—जब मनिहारी आती थी और हाथों में चूड़ियाँ पहनाती थी। चूड़ियाँ पहनाते-पहनाते कभी लोकगीत सुनाती, तो कभी आशीर्वाद दे जाती थी। सब्ज़ी वाली भी घर पर आती थी; अपना सुख-दुख सुनाते-सुनाते हमारे मन की भी पूछ लेती और तरकारी की तरह ही हरी-भरी हो जाती थी।
“पुराने कपड़े दो और नए बर्तन लो”—यह एक्सचेंज ऑफ़र आज के बच्चे नहीं जानते। मैं मानती हूँ, उनकी सोच गलत नहीं है; लेकिन इस बदलाव के साथ एक रिश्ता और उनके जीने की वजह कम हो गई, जो घर-घर जाकर सिर्फ बर्तन ही नहीं देते थे, बल्कि मुस्कुराहट और विश्वास का रिश्ता जोड़ते थे।
आज किसी के पास किसी के लिए समय नहीं है। हर चीज़ बेवजह-सी लगने लगी है। अब तो ज़िंदगी कमरे तक सिमटकर रह गई है। एक ही घर में अजनबी बने लोग, जब खुद में सिमटकर रहने लगते हैं, तो घर चाहे कितना भी बड़ा हो, मायने नहीं रखता। कमरे से कमरे तक का सफ़र भी टेलीफ़ोन से बात करके तय होता है।
पहले लोग चेहरा पढ़ते थे, अब मैसेज पढ़ते हैं। फिर हम कहते हैं—लोग समझते नहीं… कैसे समझेंगे? हमने अपनी आवाज़ पर व्यस्तता का पर्दा और चेहरे पर नक़ाब डाल रखा है।
पहले के कच्चे घरों में रिश्ते पक्के होते थे; आज घर तो मज़बूत हैं, मगर रिश्ते कमज़ोर हो चले हैं। अभाव में भी पहले लोग भाव के साथ रहते थे, पर आज सारे संसाधन होने के बावजूद अभाव नज़र आता है, जो हमें निराशा की ओर ले जाता है।
ज़रूरतें कम थीं, इसलिए ग़म भी कम थे। पहले अनजान के साथ भी एक बेफ़िक्री रहती थी, पर आज किसी से भी मिलते वक्त मन में आशंका रहती है। इस आशंका को किसने जन्म दिया—समय, परिवेश, अनावश्यक ज़रूरतें या स्वार्थी प्रवृत्ति ने…?
ये कहाँ आ गए हम, जहाँ तलाश हर किसी को “अपने” की है; लेकिन यह नहीं समझते कि एक्सचेंज ऑफ़र भावनाओं में भी ज़रूरी है। तभी अपने मिलते हैं और सपने सबके पूरे होते हैं।
सूचना स्रोत
श्रीमती प्रमिला त्रिवेदी
स्थानीय संपादिका
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
हैदराबाद
सृजक









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