कविता 'जिंदगी' - प्रमिला त्रिवेदी

भूमिका

जिंदगी शीर्षक से प्रस्तुत प्रमिला त्रिवेदी जी की यह रचना मानवीय मन की उस गहन संवेदना का चित्रण करती है, जहाँ पीड़ा, अकेलापन, टूटन और आत्मसंवाद एक साथ उपस्थित होते हैं। कवयित्री ने जीवन के कटु यथार्थ को स्वीकार करते हुए निराशा में भी आशा का दीप जलाने का प्रयास किया है। यह कविता केवल दुःख का वर्णन नहीं करती, बल्कि दुःख से जूझते हुए आत्मबोध और आत्मसाहस की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देती है।

रचना का स्वर आत्मालाप जैसा है—जहाँ कवयित्री स्वयं से प्रश्न करती है, स्वयं को समझाती है और अंततः जीवन के प्रति कृतज्ञता का भाव जगाती है। इसमें जीवन की विषमताओं, टूटते मन, कम संसाधनों और भावनात्मक उपेक्षा के बीच भी जीवित रहने की शक्ति को सबसे बड़ा सत्य बताया गया है। यह कविता पाठक को यह अहसास कराती है कि जीवन केवल सुख का नाम नहीं, बल्कि संघर्षों के बीच स्वयं को संभाल लेने की कला का नाम है।

।।जिंदगी।।

हम ग़मजदा हैं, लाएं कहाँ से खुशी।

एक बार फिर से दिल ही तो टूटा है

तो क्या हुआ,

अब तो जैसे ईश्वर भी हमसे रूठा है

तो क्या हुआ,

जेब बड़ी और पैसे हैं कम,

तो क्या हुआ,

रत्ती भर खुशियाँ और पहाड़ जितने ग़म

तो क्या हुआ,

आगे तो चलना है पर पैर नहीं बढ़ते

तो क्या हुआ,

दिल से कोई पूछता नहीं कि कैसे हो,

तो क्या हुआ,

और कोई पूछ भी ले, तो बताने को दिल नहीं करता

तो क्या हुआ,

आज नहीं बताओगे ,कल भी नहीं बताओगे,

तो क्या हुआ,

पर एक दिन आईने में, भीनी मुस्कान के साथ, पूछोगे

तो क्या हुआ,

आज थोड़े अंधेरे में हो, पर जिंदा हो, वही काफ़ी है 

तुम अकेले नहीं, तुम तुम्हारे साथ हो, ये समझदारी काफ़ी है,

जिंदगी में बहुत सारे कड़वे लम्हे तो मिले,

पर साथ में मिली सीख, मीठी टॉफी है,

बस इस वक्त ज़रा सम्भल जाओ, वही काफी है,

तुम तुम्हारे लिए बहुत हो, व्यर्थ नहीं,

तोहफ़े में मिली है  ज़िंदगी, तो उसपर  नाज करो,

लय और  ताल संग झूमो-नाचो-मुस्कुराओ।

सारांश

इस कविता में कवयित्री जीवन की उदासी, टूटे मन, कम खुशियों और अधिक ग़मों की स्थिति को स्वीकार करती हुई बार-बार “तो क्या हुआ” कहकर धैर्य और सहनशीलता का संदेश देती हैं। वह बताती हैं कि दिल टूटना, परिस्थितियों का कठोर होना, आर्थिक कमी, भावनात्मक उपेक्षा और मन की थकान—ये सब जीवन का हिस्सा हैं, परंतु इनसे जीवन का मूल्य कम नहीं होता।

कविता का मूल भाव आत्मसंवाद है, जिसमें व्यक्ति स्वयं को संभालने का प्रयास करता है। अंततः कवयित्री यह निष्कर्ष देती हैं कि अंधेरे समय में भी जीवित होना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है। स्वयं का साथ होना, अनुभवों से सीख लेना और जीवन को एक अनमोल उपहार मानकर उस पर गर्व करना ही वास्तविक समझदारी है।

इस प्रकार, यह रचना निराशा से आशा, टूटन से आत्मबल और उदासी से आत्मस्वीकार तक की एक भावनात्मक यात्रा है, जो पाठक को जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि अपनाने की प्रेरणा देती है।

रचनाकार

प्रमिला त्रिवेदी 

पाठ्य उन्नयन 



 

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