श्रीमति पूनम जैन अग्रवाल 'चाँदनी 'का आत्मकथ्य

श्रीमति पूनम जैन अग्रवाल 'चाँदनी '' का आत्मकथ्य

जब मेरे हाथों में मेरी काव्य कृति *“नारी ना हारी”* का प्रथम प्रतिरूप आया, तो वह केवल एक पुस्तक नहीं थी, वह मेरे मन, मेरी संवेदनाओं और मेरे जीवन अनुभवों की धड़कन थी। अहमदाबाद के गुजरात साहित्य अकादमी के गरिमामयी सभागार में, जब प्रख्यात साहित्यकार एवं पत्रकार विष्णु पंड्या जी के कर-कमलों द्वारा इसका विमोचन हुआ, तब मेरे लिए वह क्षण शब्दों से परे एक भावानुभूति बन गया।

उस दिन मंच पर उपस्थित सभी विद्वानों, साहित्यप्रेमियों और सम्मानित अतिथियों की स्नेहिल उपस्थिति ने मुझे यह अनुभव कराया कि मेरी लेखनी अकेली नहीं है—उसके साथ समाज की चेतना भी चल रही है। विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित विद्वानजनों ने जब इस कृति को स्त्री सशक्तिकरण का दस्तावेज कहा, तो मुझे लगा कि मेरी साधना को सार्थकता मिल गई।

*“नारी ना हारी”* मेरे लिए केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि उन अनगिनत स्त्रियों की कथा है जो मौन रहकर भी इतिहास लिखती हैं। यह उन आँखों की भाषा है, जो आँसू छुपाकर भी मुस्कुराना जानती हैं; यह उस आत्मबल की अभिव्यक्ति है, जो परिस्थितियों से टूटता नहीं, बल्कि और दृढ़ होता जाता है।

मैंने इस पुस्तक में नारी को किसी एक रूप में नहीं बाँधा—वह कभी माँ है, कभी कर्मयोगिनी, कभी संघर्षशील, तो कभी करुणा की मूर्ति। मेरी कविताओं की प्रत्येक पंक्ति में एक ऐसी नारी का स्वर है, जो हार को स्वीकार नहीं करती, बल्कि उसे अपने संकल्प की सीढ़ी बना लेती है।

जब मुख्य अतिथि विष्णु पंड्या जी ने कहा कि इस पुस्तक की हर पंक्ति नारी चेतना को जागृत करने वाली है, तब मेरे भीतर एक विनम्र भाव उमड़ आया—कि मेरी लेखनी यदि किसी एक भी मन में आत्मविश्वास जगा सके, तो वही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

इस कृति की रचना के दौरान मैंने केवल शब्द नहीं लिखे, बल्कि हर कविता को जिया है। समाज में नारी के प्रति दृष्टिकोण, उसके संघर्ष, उसकी अस्मिता और उसके अटूट साहस को महसूस करते हुए यह पुस्तक आकार ले सकी।

मैं स्वयं मानती हूँ कि नारी कभी हारती नहीं—वह परिस्थितियों से जूझते हुए, टूटकर भी जुड़ती है और फिर नए प्रकाश के साथ आगे बढ़ती है। *“नारी ना हारी”* उसी अडिग नारी शक्ति को समर्पित है, जो मौन रहते हुए भी युगों को दिशा देती है।

इस भव्य विमोचन समारोह ने मुझे न केवल सम्मान दिया, बल्कि यह विश्वास भी दिया कि मेरी लेखनी समाज की चेतना से जुड़ी है। मैं हृदय से उन सभी साहित्यप्रेमियों, आयोजकों, अतिथियों और शुभचिंतकों के प्रति कृतज्ञ हूँ, जिनके स्नेह, आशीर्वाद और विश्वास ने मेरी इस कृति को पाठकों तक पहुँचने का यह सुन्दर अवसर प्रदान किया।

मेरे लिए यह पुस्तक एक संदेश है—

नारी थक सकती है, रुक सकती है, किन्तु हारती कभी नहीं… क्योंकि उसके भीतर सृजन की शक्ति और संघर्ष का अनन्त प्रकाश सदैव जाग्रत रहता है।

पुस्तक लोकार्पण की बानगियाँ





















सूचना स्रोत

 
श्रीमति पूनम जैन अग्रवाल 'चाँदनी '
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति




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