प्रतिकार - सुनीता मीणा जी का प्रयास

अवसर

सिविल लाइन सवाई माधोपुर में खड़े विराट, बलशाली हरित योद्धाओं के संहार पर भाव विभोर श्रद्धांजलि (मेरे हृदय की पीड़ा शब्दों में)

प्रथम भाव

आज मैंने कितनों को मरते देखा 

धरा पर चीखते देखा 

तड़पते देखा 

रोते देखा 

बिलखते देखा 

उनके दर्द के सामने मेरे आंसू नहीं टिक पाए 

मैं भी चीखने लगी 

रोने लगी 

तड़पने लगी

लेकिन मेरी चीख 

मेरी तड़प 

मेरे आंसू किसी ने नहीं देखे 

उन निर्मम हत्यारों पर इन सब का कोई असर नहीं हुआ 

आखिर उन सब को मरना पड़ा 

उन हत्याओं का जिम्मेदार कौन? 

आखिर क्यों उन निर्दोषों की बलि दी गई? 

मुझे इस क्यों का जवाब आज तक नहीं मिल पाया।

द्वितीय भाव

अब न जाने क्यों सांसे रुक रही है 

दम सा घुट रहा है 

कहने को तो कुछ नहीं हुआ 

पर बहुत कुछ हुआ है 

किसे बताएं अपनी व्यथा जाकर

यहां तो हर कोई ज्यादा समझदार है 

अपना जीवन सब कुछ

और दूसरे का कुछ नहीं 

अपनी ज़रूरतें सब कुछ 

और दूसरे की कुछ नहीं 

कितने बेरहमी हो गए हैं हम 

किसी की जान भी कुछ नहीं 

क्या करेंगे इस जीवन का 

जो दूसरों के बलिदान पर टीका है 

माना बलिदान सब देते हैं 

जब ही दूसरा जीवन संवरता है

लेकिन ऐसा अनचाहा बलिदान 

जिनके जीवित रहने से ही हमारा जीवन संवरता है

वह बलिदान नहीं निर्मम हत्या है 

जो किसी स्वार्थ के लिए की है 

जो किसी लोभ लालच के लिए की है 

कितनी पीड़ा होती है यह सब सोच कर,

बस, हम सोचते ही तो नहीं है।

तृतीय भाव

मन कर रहा था 

मैं लिपट जाऊं 

कर दूं कुर्बान खुद को 

और उनको बचा लूं 

लेकिन नहीं चला बस 

आला कमान के सामने 

सत्ता के पुजारियों के सामने 

उसे फरमान के सामने 

जो आया था विकास के नाम पर 

जिसने कितनों को ही निगल लिया 

विशाल अजगर बनकर 

किसी का बुरा नहीं किया था उन्होंने 

सदैव ही अच्छा किया, दिया ही दिया 

लिया कुछ भी नहीं 

क्या यह परोपकार का फल था 

तो फिर क्यों माना परोपकार को अच्छा 

जिसको करने पर मिलता है बुरा 

कहते हैं अच्छा करो, अच्छा पाओ 

यहां तो जिंदगी ही छीन ली 

इससे बुरा क्या पाएंगे वो 

अच्छा करके अपना वजूद ही खो गए 

ऐसा कौन सा विकास का कीड़ा था 

जो उन जीवन दाताओं पर भी भारी था।

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रचनाकार

सुनीता मीणा

पाठ्य प्रस्तुति 


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