प्रेम और इसकी अनुभूतियाँ

प्रेम और इसकी अनुभूतियाँ

समाज के ताने-बाने को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए जितनी आवश्यकता प्रेम और उससे जुड़ी अनुभूतियों की है, उतनी किसी अन्य भावना की नहीं है।

प्रेम केवल अपनों तक सीमित हो, तो वह प्रेम नहीं, मोह है; और यदि वही भावना समस्त सृष्टि, अजनबियों, प्राणियों तथा मानवता के प्रति विस्तार पाए, तो वह सच्चा प्रेम है। किसी को पीड़ा में देखकर हृदय में उठी करुणा, सहानुभूति, दया और संवेदना ही प्रेम को जन्म देती हैं।

प्रेम हमारे स्वभाव का मूल तत्व है। यह अथाह सागर है, जबकि नफ़रत क्षणिक अग्नि मात्र है। प्रेम सौंदर्य, शांति, करुणा, ममता, अपनत्व, विश्वास, त्याग, सेवा, समर्पण और सह-अस्तित्व का विस्तार है; वहीं नफ़रत संकीर्ण, क्षणभंगुर और कुटिल होती है।

जब सहमा हुआ खरगोश आपकी बाहों में स्वयं को सुरक्षित महसूस करे—यह प्रेम है।

जब कोई अज्ञात स्थान पर कुत्ता आपके पैरों के पास निश्चिंत होकर लेट जाए—यह प्रेम है।

जब आपको देखकर निर्बल वृद्धों के होंठों पर मुस्कान खिल उठे—यह प्रेम है।

जब किसी भिन्न धर्म, जाति या संस्कृति के व्यक्ति की आँखों में आपके प्रति विश्वास और सम्मान की चमक बनी रहे—यह प्रेम है।

जब स्त्री और पुरुष जीवन के लंबे पथ पर एक-दूसरे का सहारा बनकर साथ चलें—यह प्रेम है।

जब मित्रता में निःस्वार्थ भाव हो, परिवार में ममता हो, समाज में सहयोग हो, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता हो, और मानवता के प्रति करुणा हो—वही प्रेम के विविध स्वरूप हैं।

माता-पिता का स्नेह, संतानों का विश्वास, मित्रों की निष्ठा, गुरु का आशीर्वाद, सेवा का भाव, त्याग की भावना, करुणा की धारा, और समस्त जीव-जगत के प्रति दयालु दृष्टि—ये सभी प्रेम के ही विभिन्न आयाम हैं।

इन्हीं सार्वभौमिक, समावेशी और मानवीय भावनाओं के साथ आप सभी को प्रेम के प्रत्येक स्वरूप का सम्मान करने और उसे जीवन में उतारने की हार्दिक शुभकामनाएँ।

रचनाकार

श्री मौसम सिंह जी

रामपुर मनिहारान, सहारनपुर (उत्तर प्रदेश)

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 



 





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