तितली से मधुमक्खी तक बेटियों के आत्मबल की यात्रा
तितली से मधुमक्खी तक
बेटियों के आत्मबल की यात्रा
भूमिका
यह रचना केवल जीवन का वर्णन नहीं, बल्कि जीवन से उपजे उस सत्य की उद्घोषणा है, जो अक्सर किताबों के पन्नों में नहीं मिलता। यहाँ बेटी एक कोमल कल्पना नहीं, बल्कि परिश्रम, साहस और आत्मरक्षा की जीवंत प्रतीक बनकर सामने आती है। जीवन के बदलते रंग—कभी उजाले, कभी अंधेरे—इस रचना में अनुभव की तरह उतरते हैं और यह सिखाते हैं कि परिस्थितियाँ हमारे अनुसार नहीं बदलतीं, हमें ही उनके अनुरूप स्वयं को गढ़ना होता है।
तितली का सौंदर्य क्षणिक है, पर मधुमक्खी का श्रम सृजनशील और स्थायी। यही संदेश इस रचना की आत्मा है—कि बेटियों को केवल सहेजने की नहीं, सक्षम बनाने की आवश्यकता है। जुगनुओं की छोटी-छोटी रोशनियाँ हमारे भीतर ही होती हैं, पर अक्सर हम सूर्य की खोज में उन्हें अनदेखा कर देते हैं। यह लेख उन्हीं अंतर्निहित प्रकाश-बिंदुओं की पहचान और उन पर विश्वास करना सिखाता है।
यह भूमिका उस विश्वास के साथ आरंभ होती है कि यदि बेटी अपने श्रम, संकल्प और आत्मसम्मान के साथ आगे बढ़े, तो एक दिन यश का सूर्य स्वयं झुककर उसकी हथेली पर अपनी रोशनी रखेगा। क्योंकि मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती—और यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है।
कविता
बेटियों को तितली नहीं, मधुमक्खी बनाओ।
जिन्दगी ने वह बहुत कुछ सिखाया,
जो कभी किताबों में था ही नहीं,
हर पल बदल जाती है जिन्दगी,
हम प्लान कुछ और करते हैं,
फिर एक नये रूप में सामने आती है ज़िन्दगी,
रोज़ एक नया सवेरा, या घनघोर अंधेरा,
कभी कभी तो मुस्कुराती है ज़िन्दगी,
हमारे पास तो जुगनूओं का प्रकाश था,
पर वो कभी दिखे ही नहीं,
हम तो सूर्य के प्रकाश के लिए ही भागते रहे,
उठते गिरते, लड़खड़ाते, तड़पड़ाते,
कभी घायल भी हो जाते,
पर अपने ध्येय से जो नहीं पीछे हटे,
बेटी को बहुत नाजों से पाला है
पर अब तुम्हें तितली से मधुमक्खी ही बनना होगा,
अपनी रक्षा स्वयं ही करना है,
परिस्थिति से लड़ना होगा,
तुम्हारे लिए, एक दिन सूर्य को ही नीचे झुककर तुम्हारी,
हथेली पर यश की रोशनी रखनी होगी।
अगर मेहनत करोगे तो यश की रोशनी मिलेगी।
और मेहनत रंग लाती ही है।
इसी का नाम जिन्दगी है।
रचनाकार
प्रमिला त्रिवेदीपाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति







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