उलझन-सुलझन (दुविधा और उसका निवारण)
दुविधा
प्रयास यदि अद्वितीय हों और माध्यमों का सही दिशा में उपयोग हो तथा संबंधित मानव संपदा उपयोग, सदुपयोग एवं दुरुपयोग को जाने-समझे तो कोई कारण नहीं कि सूचनाओं के प्रसार में कोई कमी रह जाए। इसको सत्यापित करें तो आखिर करें कैसे?
दुविधा का निवारण
सूचनाओं के प्रभावी प्रसार की त्रिवेणी
समकालीन समाज में यह एक स्थापित तथ्य है कि सूचना की उपलब्धता अब दुर्लभ नहीं रही। सूचना हर ओर है—मुद्रित माध्यमों में, डिजिटल मंचों पर, सामाजिक संवादों में। इसके बावजूद यदि यह प्रश्न उठता है कि सूचनाओं के प्रसार में कहीं कोई कमी रह जाती है, तो यह कमी *सूचना की मात्रा* से नहीं, बल्कि *सूचना की गुणवत्ता, दिशा और स्वीकार्यता* से जुड़ी है। इसी संदर्भ में यह विचार अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि यदि प्रयास अद्वितीय हों, माध्यमों का सही दिशा में उपयोग हो और संबंधित मानव संपदा उपयोग, सदुपयोग एवं दुरुपयोग को समझती हो, तो सूचनाओं के प्रसार में कोई बाधा शेष नहीं रहनी चाहिए। परंतु इस कथन का सत्यापन भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ के धरातल पर होना आवश्यक है।
जब हम भारतीय समाज के हालिया इतिहास पर दृष्टि डालते हैं, तो पोलियो उन्मूलन अभियान एक ऐसी सत्य घटना के रूप में सामने आता है, जहाँ ये तीनों शर्तें एक साथ उपस्थित थीं। यह केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक अद्वितीय सामाजिक प्रयास था, जिसने पारंपरिक स्वास्थ्य अभियानों की सीमाओं को तोड़ा। घर-घर जाकर बच्चों को टीका देना, दूरस्थ और जोखिमपूर्ण क्षेत्रों तक पहुँच बनाना, अफवाहों और धार्मिक भ्रांतियों का संवेदनशील संवाद के माध्यम से समाधान करना—ये सभी प्रयास अपने आप में असाधारण थे। इस अभियान में माध्यमों का चयन भी परिस्थिति-सापेक्ष और समाजोपयोगी था—रेडियो, दूरदर्शन, समाचार पत्रों के साथ-साथ समाज में विश्वसनीय माने जाने वाले व्यक्तित्वों और धार्मिक-स्थानीय नेतृत्व को जोड़ा गया। सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि इस पूरे अभियान में मानव संपदा की मानसिकता, भय, विश्वास और व्यवहार को समझकर संवाद किया गया। परिणामस्वरूप सूचना केवल पहुँची नहीं, बल्कि स्वीकार की गई और व्यवहार में उतरी। यह घटना स्पष्ट रूप से प्रमाणित करती है कि जब तीनों शर्तें समन्वित रूप से कार्य करती हैं, तब सूचना सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन जाती है।
इसके विपरीत, यदि हम उन परिस्थितियों को देखें जहाँ माध्यमों का उपयोग तो सही दिशा में हुआ और मानव व्यवहार की समझ भी मौजूद रही, किंतु प्रयास अद्वितीय नहीं थे, तो प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित दिखाई देता है। अनेक सरकारी योजनाओं के प्रचार इसका उदाहरण हैं। टीवी, अख़बार और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर प्रसारित विज्ञापन सरल भाषा में होते हैं, आम जनजीवन के पात्रों को प्रस्तुत करते हैं और समाज की आर्थिक-सामाजिक जरूरतों को ध्यान में रखते हैं। इसके बावजूद, क्योंकि इन अभियानों में नवाचार और विशिष्टता का अभाव रहता है, वे अक्सर सूचना की भीड़ में खो जाते हैं। सूचना यहाँ पहुँचती तो है, पर वह जिज्ञासा, प्रेरणा और सहभागिता उत्पन्न नहीं कर पाती। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि सही माध्यम और मानव समझ के बावजूद, यदि प्रयास साधारण हों, तो सूचना का प्रभाव सीमित रह जाता है।
एक अन्य सामाजिक परिदृश्य उन आंदोलनों में देखने को मिलता है जहाँ प्रयास अत्यंत अनूठे होते हैं और मानव व्यवहार की गहरी समझ भी दिखाई देती है, किंतु माध्यम सीमित रह जाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में चलाए गए अनेक सामाजिक सुधार अभियान—जैसे नशा विरोधी लोकनाट्य या जनगीत—इसका उदाहरण हैं। इन प्रयासों में स्थानीय भाषा, सांस्कृतिक प्रतीकों और भावनात्मक जुड़ाव का प्रभावी उपयोग किया गया, जिससे सीमित समुदाय में गहरा असर पड़ा। परंतु चूँकि माध्यम व्यापक नहीं थे, इसलिए संदेश उसी भौगोलिक या सामाजिक दायरे तक सिमट कर रह गया। यहाँ यह स्पष्ट होता है कि बिना उपयुक्त माध्यम के, सर्वश्रेष्ठ प्रयास भी व्यापक समाज तक नहीं पहुँच पाते।
इसी क्रम में वे परिस्थितियाँ भी विचारणीय हैं जहाँ प्रयास आकर्षक होते हैं और माध्यम अत्याधुनिक, किंतु मानव संपदा की समझ का अभाव रहता है। सोशल मीडिया पर अचानक चलाए गए अनेक जन-अभियान, जिनमें समाज की संवेदनशीलताओं, परंपराओं और मानसिक स्थितियों को अनदेखा कर दिया जाता है, अक्सर भ्रम, विरोध और अविश्वास को जन्म देते हैं। यहाँ सूचना का स्वर तीव्र होता है, पर संवाद कमजोर। परिणामस्वरूप सूचना समाज को जोड़ने के स्थान पर विभाजन उत्पन्न कर देती है। यह दर्शाता है कि मानव व्यवहार की समझ के बिना सूचना प्रसार, प्रभावी होने के बजाय प्रतिकूल भी हो सकता है।
इन सभी सामाजिक सत्य घटनाओं का तुलनात्मक अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि सूचनाओं के प्रभावी, स्थायी और सकारात्मक प्रसार के लिए किसी एक या दो शर्तों का होना पर्याप्त नहीं है। अद्वितीय प्रयास सूचना को विशिष्ट बनाते हैं, सही माध्यम उसे समाज के अंतिम छोर तक पहुँचाते हैं और मानव संपदा की समझ उसे स्वीकार्य एवं व्यवहार्य बनाती है। इन तीनों का अभाव या असंतुलन सूचना को या तो कमजोर, सीमित या विवादित बना देता है।
अतः यह निष्कर्ष तर्कसंगत और सत्यापित रूप में सामने आता है कि सूचनाओं के प्रसार में कमी को दूर करने के लिए इन तीनों शर्तों का समन्वित पालन अनिवार्य है। सूचना तब ही समाज में बोध का निर्माण कर पाती है, जब वह प्रयास, माध्यम और मानवीय समझ की त्रिवेणी में प्रवाहित होती है। यही त्रिवेणी दुविधा का निवारण भी करती है और सत्यापन का आधार भी बनती है।
सूचना स्रोत



विचारो की एवं तत्थो की उत्तम समीक्षा । धन्यवाद सुप्रभात
ReplyDeleteआभार
Delete