दिव्य देवनारायण दर्शन - मानव जीवन, कर्म और समरसता का पथ
दिव्य देवनारायण दर्शन
मानव जीवन, कर्म और समरसता का पथ
आदि देव श्री देवनारायण को दिव्य चेतना, ऊर्जा और प्रकाश का प्रतीक माना जाता है। उनका दर्शन मानव जीवन को कर्म, धर्म और पुरुषार्थ के संतुलित मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। यह केवल पूजा या उपासना की विधि नहीं, बल्कि समग्र मानव जीवन को देखने और जीने की दृष्टि है।
सनातन भारतीय दर्शन में शिव तत्व को चेतना, आनंद और शक्ति का मूल कहा गया है। कश्मीरी प्रत्यभिज्ञा दर्शन में शिव की पाँच प्रमुख शक्तियों का वर्णन मिलता है—
चित्त शक्ति (चेतना का प्रकाश), आनंद शक्ति (स्वतंत्र आनंद की अनुभूति), इच्छा शक्ति (संकल्प), ज्ञान शक्ति (बोध) और क्रिया शक्ति (सृष्टि का संचालन)।
इन सबका संयुक्त रूप ही शिव तत्व है, जो सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी और चेतना के रूप में सर्वत्र विद्यमान है।
भारतीय दर्शन के अनुसार ईश्वर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चंद्रमा और आत्मा—इन आठ रूपों में प्रकट होता है। यही चेतन तत्व प्रत्येक मानव के भीतर भी विद्यमान है।
श्री देवनारायण को नारायण के ग्यारह कला अवतार के रूप में स्वीकार किया गया है। उनकी पूजा “ईंटों में श्याम दर्शन” जैसे प्रतीकात्मक रूप में की जाती है। इसका अर्थ है—साधारण जीवन और साधारण वस्तुओं में भी दिव्यता का अनुभव। यह पूजा कर्म, त्याग और संतुलन का प्रतीक है।
कश्मीरी प्रत्यभिज्ञा दर्शन के महान आचार्य अभिनव गुप्त श्री देवनारायण के समकालीन माने जाते हैं। उन्होंने आदि देव श्री देवनारायण फड़ चित्रपट लोकवार्ता को दार्शनिक दृष्टि से समझा और प्रतिपादित किया।
यह लोकवार्ता गुर्जरी भाषा में कही गई, जिससे यह दर्शन सीधे लोक जीवन से जुड़ गया।
देवनारायण फड़ केवल चित्रों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह मानव, प्रकृति और ईश्वर के आपसी संबंध को प्रतीकों के माध्यम से प्रस्तुत करता है। इन चित्रों का निर्माण कुल भाटों द्वारा दिव्य प्रेरणा से किया गया, ताकि लोक सामान्य भी इस दर्शन को समझ सके।
आदि देव श्री देवनारायण ने गुर्जर वंश के उद्धार और लोक आराधना के लिए अपने परिवार, 33 कोटि देवी-देवताओं तथा अपने पुत्र बिल्व देवनाथ को ईंट–पाट–ज्योति स्वरूप पूजा-पद्धति का स्वयं उपदेश दिया।
यही परंपरा आगे चलकर आदि गुरु शिव स्वरूप गज-बेली गुदड़नाथ और बिल्व देवनाथ की दीक्षा परंपरा से जुड़ी।
श्री देवनारायण गोंळ धारण परंपरा को एक सहज, लोकजीवन से जुड़ा कर्मयोग बताया गया—
जहाँ नियत कर्म, कर्मफल का त्याग और यज्ञ भाव के माध्यम से दिव्यता की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
आचार्य अभिनव गुप्त ने इस संपूर्ण परंपरा को प्रत्यभिज्ञा दर्शन के रूप में समझाया—
अर्थात मनुष्य को यह बोध कराना कि दिव्य चेतना बाहर नहीं, उसके अपने भीतर ही विद्यमान है।
आज के समय में देवनारायण फड़ लोकवार्ता को वैज्ञानिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक दृष्टि से पुनः समझने की आवश्यकता है, क्योंकि यह परंपरा धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है।
वीर गुर्जर साम्राज्य काल में, गुरुत्तर गुरुओं के नेतृत्व में अखंड सांस्कृतिक भारत के निर्माण हेतु जो सामाजिक, सांस्कृतिक और सनातन समरसता का कार्य हुआ, उस पर इतिहास में कई बार जानबूझकर पर्दा डाला गया।
राजनीतिक कारणों से हुई इस ऐतिहासिक क्षति को समझना और सत्य को सामने लाना आज आवश्यक है।
अखंड भारतीय संस्कृति में समय के साथ प्रवेश कर गई अनेक भ्रांतियों और मिथ्या विकारों का परिमार्जन करने का तात्विक आधार हमें आचार्य अभिनव गुप्त के प्रत्यभिज्ञा दर्शन में मिलता है। यह दर्शन विभाजन नहीं, बल्कि एकात्मता, चेतना और समरसता का संदेश देता है।
आदि देव श्री देवनारायण ने अपने समय के लोक जीवन के समक्ष समग्रतावादी समरसता का आधार प्रस्तुत किया—
जहाँ कोई ऊँच-नीच नहीं, कोई हेय या त्याज्य नहीं,
और यह संपूर्ण संसार दिव्य सत्ता का ही प्रकट रूप है।
यही श्री देवनारायण दर्शन का मूल संदेश है—
लोक में रहकर, कर्म करते हुए, अपनी चेतना की पहचान और मानव मात्र का कल्याण।
जय श्री देवनारायण
रचनाकार
मोहनलाल वर्मा
संपादक : देव चेतना मासिक पत्रिका, जयपुर
राष्ट्रीय उपाध्यक्ष : गुर्जर इतिहास, साहित्य एवं भाषा शोध संस्थान
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