दिव्य ज्योतिर्मय गुरुतर गुरु गोपते
दिव्य ज्योतिर्मय गुरुतर गुरु गोपते
गुर्जर गोपाल
सभ्यता और संस्कृति का संक्षिप्त व बोधगम्य दर्शन
अखंड भारत राष्ट्र की अवधारणा प्रकृति से जुड़ी हुई है। जंबूद्वीप में स्थित भारतखंड को मनुष्य ने नाम दिया, किंतु इसकी आत्मा प्रकृति से संचालित है। सृष्टि का रचयिता स्वयं स्थिर है, पर वही संपूर्ण जगत को गति देता है। सभी प्राणी नश्वर हैं और नश्वरता का स्वभाव ही है—भूल करना।
सूर्य का एक नाम भारत भी है। सूर्य की किरणें जहाँ-जहाँ तक पहुँचती हैं, वहीं तक जीवन है। इसी अर्थ में अखंड भारत राष्ट्र को सूर्य की दिव्य ज्योति से जोड़ा गया है। मनुष्य के भीतर भाव, कल्पना और अनुभूति का केंद्र मस्तिष्क है, किंतु अत्यधिक तर्क-वितर्क मन का दोष बन जाता है।
पुरुष तत्व को भारतीय दर्शन में दिव्य प्राण ऊर्जा माना गया है—“मनोमयोऽयं पुरुष:”
मनुष्य का मन हृदय में सूक्ष्म रूप में स्थित होकर संपूर्ण देह का संचालन करता है। यही मन राष्ट्र, समाज और व्यवस्था की रचना करता है।
सूर्य केवल प्रकाश नहीं, बल्कि जीवन-ऊर्जा का स्रोत है। देह में अग्नि, तेज और चेतना—सूर्य की दिव्य ज्योति के ही रूप हैं। संसार के रंग सूर्य की किरणों से उत्पन्न होते हैं। पुराणों में सूर्य की किरणों को छंदों और शक्तियों के रूप में वर्णित किया गया है।
सूर्य की तीन शक्तियाँ—उत्पादन, पालन और संहार—जीवन चक् आधार हैं। इसीलिए भारतीय परंपरा में सूर्य को परमात्मा, जगतगुरु और जीवनदाता कहा गया है।
स्त्री–पुरुष संबंध और जीवन दर्शन
यदि प्रेमविहीन विवाह को पवित्र माना जाता है, तो प्रेमयुक्त संबंध को पाप क्यों कहा जाए—यह प्रश्न भारतीय चिंतन में सदैव उपस्थित रहा है। स्त्री और पुरुष का संबंध केवल सामाजिक नहीं, बल्कि जैविक, मानसिक और आध्यात्मिक भी है।
शिव–शक्ति का दर्शन बताता है कि सृष्टि का आधार नारी शक्ति है। संतान के पालन-पोषण के लिए स्त्री-पुरुष का दीर्घकालीन साथ आवश्यक हुआ, जिससे विवाह संस्था का जन्म हुआ।
भारतीय पुराणों के आख्यान—देव-असुर संग्राम, समुद्र मंथन, महाभारत—सब अंतर्मन के संघर्ष और चेतना के विकास के प्रतीक हैं। ये कथाएँ मनुष्य को भय से अभय की ओर ले जाने की आध्यात्मिक प्रक्रिया को समझाती हैं।
आत्म प्रबंधन : जीवन को समझने की कला
आधुनिक समाज में व्यक्ति का मूल्य उसकी आय से आँका जाने लगा है, जैसे राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को जीडीपी से। किंतु मनुष्य का वास्तविक मूल्य उसकी संबंध बनाने की क्षमता, विवेक, और आंतरिक संतुलन में है।
समाज परस्परावलंबन से चलता है। जहाँ व्यवहार है, वहाँ समस्याएँ भी हैं। समाधान बाहर नहीं, भीतर से आता है—यही आत्म प्रबंधन है।
सुख और दुख का कारण बाहर नहीं, हमारे भीतर होता है। दूसरे को बदलने से पहले स्वयं को समझना आवश्यक है। आत्म निरीक्षण से ही शांति, आनंद और अभय संभव है।
हम प्रायः दूसरों को उनके वास्तविक स्वरूप में नहीं, बल्कि अपनी कल्पनाओं और संस्कारों के चश्मे से देखते हैं। इसलिए न हम किसी को पूरी तरह जान पाते हैं, न न्याय कर पाते हैं।
मनुष्य : एक जीवित प्रयोगशाला
मनुष्य का जीवन अंतर्मन मंथन की प्रयोगशाला है। इसी मंथन से आध्यात्मिक चेतना का नवनीत प्राप्त होता है।
प्रकृति का हर कण एक-दूसरे से जुड़ा है। पर्यावरण चेतना का अर्थ है—प्रकृति को उसके स्वाभाविक रूप में रहने देना।
जब दृष्टि और चरित्र की मूर्छा टूटती है, तभी जागरण होता है।
गुर्जर देव दर्शन और लोक परंपरा
उत्तराखंड के द्वाराहाट में स्थित गुर्जर देव मंदिर के अवशेष गुर्जर लोक चेतना और सहज जीवन धर्म के प्रतीक हैं। कश्मीर का अद्वैत शैव दर्शन और आचार्य अभिनवगुप्त की *प्रत्यभिज्ञा दर्शन* परंपरा आत्म प्रबंधन के लक्ष्य को स्पष्ट करती है—ज्योतिर्मय चेतना में स्थित होना।
गुर्जर लोक संस्कृति में देवनारायण अवतार मानव चेतना के परिष्कृत रूप का प्रतीक हैं। उनका संदेश स्पष्ट है—पृथ्वी पर मनुष्य से बड़ा कोई देव नहीं।
निष्कर्ष
आत्म प्रबंधन प्रविधि ही कर्म, ज्ञान, भक्ति और विवेक का समन्वय है।
लेने की इच्छा मन को संकुचित करती है, देने की भावना मनुष्य को विराट बनाती है।
प्रेम ही भक्ति की शुरुआत है और समर्पण उसका पूर्ण रूप।
मनुष्य जब पदार्थ में चेतना और चेतना में पदार्थ को देखने लगता है—तभी जीवन का यथार्थ प्रकट होता है।
रचयिता
श्री मोहनलाल वर्मा जी
संपादक, देव चेतना
जयपुर (राज.)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति


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