आत्मकथ्य—शिवराज कुर्मी

भूमिका

प्रकृति, पक्षी और मनुष्य के बीच का संबंध केवल सह-अस्तित्व का नहीं, बल्कि संवेदना और संवाद का है। जब विकास की अंधी दौड़ में हम अपने आँगन की चहचहाहट को खोते चले जाते हैं, तब ऐसे प्रयास आशा की नई किरण बनकर सामने आते हैं। साहित्य मंच, टोडारायसिंह के तत्वावधान में गौरैया संरक्षण जैसे अभियानों के माध्यम से न केवल पर्यावरणीय चेतना को जीवित रखने का कार्य किया जा रहा है, बल्कि नई पीढ़ी के मन में प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व और करुणा का भाव भी रोपा जा रहा है। यह लेखन उसी अनुभवजन्य अभिव्यक्ति का स्वर है, जहाँ शब्द केवल सूचना नहीं देते, बल्कि मनुष्य को उसके मूल से जोड़ते हुए संरक्षण और संवेदनशीलता की ओर प्रेरित करते हैं।

आत्मकथ्य—शिवराज कुर्मी

संयोजक, साहित्य मंच, टोडारायसिंह, जिला टोंक

साहित्य मंच, टोडारायसिंह के तत्वावधान में गांधी बाल विद्या मंदिर माध्यमिक विद्यालय, बनेठा में आयोजित *“गौरैया संरक्षण—एक पहल”* अभियान मेरे लिए केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि संवेदनशील चेतना से जुड़ने का अवसर रहा। गौरैया, जो कभी हमारे आँगन की नियमित अतिथि थी, आज विलुप्ति के कगार पर है—और यह स्थिति मानव की ही बनाई हुई परिस्थितियों का परिणाम है।

कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों को गौरैया चिड़िया के रहन-सहन, खान-पान, स्वभाव, आपसी प्रेम भावना और किसान-हितैषी भूमिका के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। मैंने बच्चों को बताया कि गौरैया केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि हमारी पारंपरिक जीवनशैली, पर्यावरणीय संतुलन और ग्रामीण संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। प्रातःकाल इसकी चहचहाहट परिवार के लिए सुकून और शुभ संकेत मानी जाती रही है।

दुर्भाग्यवश, आधुनिक जीवनशैली के दुष्परिणाम—जैसे मोबाइल टावरों से निकलने वाली घातक किरणें, जहरीला धुआँ, गैस, रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाएँ—गौरैया के अस्तित्व को गम्भीर रूप से प्रभावित कर रही हैं। ये कारक न केवल इसके प्राकृतिक आवास को नष्ट कर रहे हैं, बल्कि इसके प्रजनन पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं।

गौरैया संरक्षण के लिए विद्यार्थियों को सरल और व्यावहारिक उपायों से जोड़ा गया। उन्हें प्रेरित किया गया कि वे प्रतिदिन अपने घर की छत या आँगन में एक मुट्ठी दाना और पानी का सकौरा अवश्य रखें, ताकि गौरैया के साथ-साथ अन्य पक्षियों का भी संरक्षण हो सके। साथ ही, मकानों में कागज के डिब्बों या मिट्टी के बने घोंसले लगाकर गौरैया के सुरक्षित प्रजनन में सहयोग देने का संदेश दिया गया।

कार्यक्रम को रचनात्मक बनाने हेतु बच्चों को गौरैया के पोस्टर दिखाए गए और ऐसे ही चित्र बनाने के लिए प्रोत्साहित किया गया, जिससे उनके भीतर संवेदना और संरक्षण का भाव और गहरा हो। इसी क्रम में बच्चों को विलुप्त होती *पत्र-विधा* के महत्व से भी अवगत कराया गया और अपने रिश्तेदारों व परिजनों को समय-समय पर पत्र लिखने हेतु प्रेरित किया गया, ताकि संवाद की आत्मीय परंपरा जीवित रह सके।

विद्यालय परिवार के समस्त शिक्षकगणों की उपस्थिति और सहयोग ने इस आयोजन को सार्थक बनाया। मेरा दृढ़ विश्वास है कि यदि बच्चों के मन में आज से ही प्रकृति, पक्षियों और संवेदनशील संवाद के प्रति जिम्मेदारी का बीज बोया जाए, तो भविष्य में एक अधिक संतुलित, करुणामय और पर्यावरण-अनुकूल समाज का निर्माण निश्चित है। गौरैया का संरक्षण दरअसल जीवन के संरक्षण की दिशा में उठाया गया एक छोटा, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है।

चित्रदीर्घा






सूचना स्रोत 
श्री शिवराज जी कुर्मी
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 





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