श्री प्रवेंद्र दहिया का निर्णय
भूमिका
यह आह्वान-पत्र उस सरल लेकिन गहन सत्य से प्रेरित है, जिसे एक प्रधानाचार्य—श्री प्रवेंद्र दहिया—ने नेशनल नेचुरोपैथी डे-2025 के अवसर पर अपने मंथन के रूप में महसूस किया। एक शिक्षा-पुरुष होने के नाते उन्होंने समझा कि स्वास्थ्य केवल दवाओं पर आधारित प्रणाली नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्य की जीवन-पद्धति है। जब उन्होंने अपने विद्यार्थियों को प्राकृतिक चिकित्सालय ले जाने का निर्णय लिया, तो यह संदेश स्पष्ट हुआ कि यदि एक शिक्षक, एक प्रबुद्ध नागरिक, इतनी सहजता से प्राकृतिक चिकित्सा का महत्व समझ सकता है, तो सामान्य जन भी इस मार्ग को अपना सकते हैं। इसी विचार को जन-जागृति का स्वर देने, और प्रकृति-आधारित स्वास्थ्य को समाज की सहज धारा बनाने के उद्देश्य से यह आह्वान जनचेतना मिशन की ओर से प्रस्तुत किया गया है।
श्री प्रवेंद्र दहिया का मंथन
(निमंत्रण प्राप्त होने के बाद)
जब 8वें नेशनल नेचुरोपैथी डे के आयोजन हेतु निमंत्रण प्राप्त हुआ, तो श्री प्रवेंद्र दहिया के मन में एक स्वाभाविक प्रश्न उठा—क्या आज के बच्चों को प्राकृतिक चिकित्सा जैसी प्राचीन किंतु अत्यंत उपयोगी पद्धति के बारे में पर्याप्त जानकारी है?
उन्होंने सोचा कि आधुनिक जीवन ने जहाँ सुविधाएँ दी हैं, वहीं शरीर को प्रकृति से दूर भी कर दिया है। ऐसे में विद्यार्थियों को वास्तविक जीवन की ऐसी उपचार प्रणालियाँ दिखाना आवश्यक है, जिन्हें देखकर वे स्वास्थ्य और प्रकृति के बीच के गहरे संबंध को समझ सकें।
इस निमंत्रण ने उन्हें अपने भीतर छिपे दायित्व को भी याद दिलाया—कि एक शिक्षक केवल पाठ्य-पुस्तक का ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि जीवन-पद्धति का बोध भी कराता है। उन्होंने मन ही मन निश्चय कर लिया कि इस अवसर को वे सिर्फ एक भ्रमण तक सीमित नहीं रहने देंगे, बल्कि विद्यार्थियों के मन में एक प्रश्न, एक जिज्ञासा, एक नई दृष्टि अवश्य जगाएँगे।
उन्होंने अपने विद्यालय के साथियों से चर्चा की, कार्यक्रम के उद्देश्य पर गंभीरता से विचार किया और निर्णय लिया कि जो भी विद्यार्थी नेचुरोपैथी के बारे में अधिक सीखना चाहते हैं, उन्हें इस आयोजन से जोड़ना चाहिए। उनके लिए यह केवल एक “विज़िट” नहीं, बल्कि “जीवन-शैली की एक नई खिड़की खोलने का अवसर” होने वाला था।
श्री प्रवेंद्र दहिया की आयोजन-प्रत्याभूति
(कार्यक्रम में विद्यार्थियों संग सहभाग के बाद)
जब वे विद्यार्थियों के साथ प्राकृतिक चिकित्सालय पहुँचे, तो वातावरण की सादगी, स्वच्छता और शांतिमय ऊर्जा ने उन्हें तुरंत प्रभावित कर लिया। महात्मा गांधी जी के चित्र पर पुष्प अर्पित होते देखकर उन्हें वही संदेश स्मरण हो आया—
“सरलता ही स्वास्थ्य की पहली सीढ़ी है।”
‘प्राकृतिक आहार’ पर आयोजित कार्यशाला में जब विशेषज्ञों ने बताया कि शरीर स्वयं-उपचार की शक्ति रखता है और प्रकृति उसकी सर्वश्रेष्ठ चिकित्सक है—तो श्री दहिया को लगा कि यह ज्ञान वास्तव में पाठ्य-पुस्तक से अधिक महत्वपूर्ण है। विद्यार्थियों की आँखों में उत्सुकता देखकर उन्हें अपने निर्णय पर गर्व हुआ।
मिट्टी चिकित्सा, जल चिकित्सा और सूर्य स्नान जैसी विधियों के प्रत्यक्ष उदाहरणों ने बच्चों को चकित किया। उन्हें यह अनुभव हुआ कि बिना दवाइयों के भी स्वास्थ्य संरक्षण संभव है—और यह ज्ञान श्री दहिया के लिए आयोजन की सबसे बड़ी सफलता थी।
जब उन्होंने देखा कि विद्यार्थी चिकित्सकों से प्रश्न पूछ रहे हैं, नोट्स बना रहे हैं और बातें समझने का प्रयास कर रहे हैं—तो उनके मन में संतोष की एक उजली तरंग उठी। एक शिक्षक के रूप में उन्हें लगा कि आज का दिन केवल बच्चों के लिए ही नहीं, बल्कि उनके स्वयं के लिए भी एक सीख बन गया।
इस आयोजन से लौटते समय श्री दहिया के मन में यही भाव बार-बार उमड़ रहा था—
“यदि हम बच्चों के मन में प्रकृति और स्वास्थ्य के संबंध की एक छोटी सी लौ भी जला सकें, तो भविष्य में वही लौ समाज के लिए बड़ा प्रकाश बन सकती है।”
सूचना सूत्र



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