प्रधानाचार्य श्री प्रवेंद्र दहिया का आत्मकथ्य

भूमिका

यह हुनर ‘द टैलेंट शो’ एवं विज्ञान प्रदर्शनी केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि प्रधानाचार्य श्री प्रवेंद्र दहिया की दूरदर्शी शैक्षिक सोच का प्रत्यक्ष विस्तार है—जहाँ प्रतिभा को मंच मिलता है, विज्ञान को जीवन मिलता है और बच्चों को अपने भीतर छिपी सम्भावनाओं को पहचानने का अवसर। इस आयोजन के पीछे उनकी यह धारणा सदैव सक्रिय रही कि शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रहकर अनुभव, प्रयोग, अभिव्यक्ति और नवाचार के समन्वय से ही पूर्ण होती है। यही कारण है कि इस संकलित आत्मकथ्य में उनकी दृष्टि, उनकी प्रेरणा और उनकी उस सतत यात्रा की झलक मिलती है, जो हर विद्यार्थी को ‘सीखने’ से आगे ‘सृजन करने’ की ओर अग्रसर करती है।

प्रधानाचार्य श्री प्रवेंद्र दहिया का आत्मकथ्य

हुनर ‘द टैलेंट शो’ एवं विज्ञान प्रदर्शनी

एक दूरदर्शी आयोजन के पीछे मेरी सोच

“विद्यालय केवल भवनों का समूह नहीं होता, वह आने वाले भारत की प्रयोगशाला होता है”— इसी विचार के साथ जब मैंने ‘हुनर—द टैलेंट शो’ और विज्ञान प्रदर्शनी का खाका अपने मन में तैयार किया, तो मेरे सामने केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि हमारे विद्यार्थियों का भविष्य चमकता हुआ खड़ा था।

मैं चाहता था कि हमारे बच्चे दर्शक नहीं, सृजनकर्ता बनें; केवल सीखने वाले नहीं, बल्कि स्वयं को दुनिया के सामने सिद्ध करने वाले बनें।

अतिथि-चयन को लेकर मेरी दृष्टि

मेरे मन में एक ही विचार था—

“यदि बच्चों को प्रेरित करना है तो मंच पर वही लोग हों, जो स्वयं प्रेरणा के पर्याय हैं।”

इसीलिए मैंने विविध क्षेत्रों के उन व्यक्तित्वों को आमंत्रित किया—

* कला-संस्कृति के प्रतिनिधि,

* नवाचार और रोबोटिक्स के विशेषज्ञ,

* सामाजिक सरोकारों से जुड़े कर्मवीर,

* पुलिस, शिक्षा और तकनीक जगत के विशिष्ट अधिकारी।

मेरा उद्देश्य सरल था—

बच्चे जब मंच पर खड़े हों तो उन्हें सिर्फ तालियाँ न मिलें; उन्हें यह अनुभव हो कि देश के विभिन्न क्षेत्रों में योगदान देने वाले लोग उनकी क्षमता को पहचान रहे हैं।

मैं चाहता था कि प्रत्येक अतिथि, बच्चों के लिए एक जीवंत पाठ, एक चलता-फिरता भविष्य बने।

कार्यक्रम की संपूर्ण रूपरेखा—मेरी कल्पना से आपकी कल्पना तक यह कार्यक्रम मेरे लिए किसी वार्षिक आयोजन से कहीं अधिक था। मैं इसे विद्यालय के ‘त्रिविध विकास मॉडल’—वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और सामाजिक— का जीवंत रूप मानता हूँ।

1. टैलेंट शो – ताकि बच्चे अपनी कला और भावनात्मक अभिव्यक्ति को पहचान सकें।

2. विज्ञान प्रदर्शनी – ताकि वे जिज्ञासा को प्रयोग में बदलना सीखें।

3. अतिथियों का संवाद – ताकि उन्हें लगे कि उनके सपने देश की आवश्यकता हैं।

मेरे मन में इस कार्यक्रम की रचना करते समय एक ही दृश्य उभरता था—

“गाँव के बच्चे आत्मविश्वास से भरे, अपने मॉडल और प्रस्तुतियों के साथ मंच पर खड़े हैं, और देश के विशेषज्ञ उनसे कह रहे हैं— ‘हम तुम पर भरोसा करते हैं।’”

यदि एक भी बच्चा इस मंच से प्रेरित होकर अपनी दिशा बदल लेता है,

यदि एक भी बच्चा विज्ञान में करियर बनाने का निश्चय कर लेता है,

या एक भी बच्चा अपने हुनर की कीमत पहचान लेता है—

तो मैं मानूंगा कि यह आयोजन केवल सफल नहीं, अर्थपूर्ण हुआ।

मैं यह क्यों करता हूँ?

क्योंकि मुझे विश्वास है—

“ग्राम्य भारत का बच्चा अवसर मिलने पर दुनिया को बदल सकता है।”

इसलिए विद्यालय में मैं केवल शिक्षा नहीं, संस्कार, आत्मविश्वास, जिज्ञासा और कल्पनाशीलता का वातावरण बनाना चाहता हूँ।

ये कार्यक्रम उसी सोच की परिणति हैं।

एक संदेश, जो मैं प्रत्येक पाठक तक पहुँचाना चाहता हूँ कि जीवन में कोई भी आयोजन, कोई भी कार्य तभी सार्थक होता है जब उसमें कल्पना, उद्देश्य और सामाजिक जिम्मेदारी—ये तीनों साथ हों।

मैं अपने विद्यार्थियों में यही बीज बोना चाहता हूँ:

* कल्पना करो,

* साहस करो,

* और फिर अपने सामर्थ्य को दुनिया के सामने लाओ।

यही वह दृष्टि है जिसे आज हर माता-पिता, हर शिक्षक और हर समाजसेवी यदि अपनाए, तो आने वाली पीढ़ी अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाने में सक्षम होगी।

प्रोग्राम की झलकियां















सूचना स्रोत

श्री प्रवेंद्र दहिया

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 



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