उलझनों के पार उम्मीद की रोशनी

भूमिका

जब जीवन में अंधेरा घना हो, रात बहुत काली लगे और मन किंकर्तव्यविमूढ़ हो उठे, तब बस एक हल्की-सी किरण ही पर्याप्त होती है—जो उस घने अंधकार को चीर कर राह दिखा सके। मैं आशा गुप्ता—नाट्य कलाकार, लेखिका, कवयित्री, समाजसेविका और सबसे पहले एक संवेदनशील इंसान—अपनी उसी यात्रा को साझा कर रही हूँ, जिसमें दुख-सुख, तनाव-अवसाद सबने साथ निभाया। सफलता की ऊँचाइयों को छूने के बाद भी एक समय ऐसा आया जब सबकुछ धुंधला पड़ने लगा, जैसे मेरा अस्तित्व ही खो गया हो। अवसाद ने मन को इतना जकड़ लिया कि जो हमेशा दूसरों को राह दिखाती रही, वही खुद राह भूल बैठी। पर धीरे-धीरे समझ आया कि इससे बाहर आने के लिए संयम और आत्म-स्वीकृति सबसे जरूरी है। व्यायाम से शरीर को मजबूती मिली, अपने लोगों के बीच रहने से मन का अकेलापन कम हुआ, और सबसे महत्वपूर्ण—मैंने स्वयं को माफ करना सीखा। लिखना मेरे लिए थेरेपी बन गया; कागज़ पर उतरे शब्द मन की गांठें खोलते चले गए। समय लगा, पर विचार बदले, लक्ष्य तय किए और हर दिन खुद को एक कदम आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। आज, आकाशवाणी श्रीविजयपुरम (पोर्ट ब्लेयर) से मेरे धारावाहिक में नई सोच, नये सपने का प्रसारण हो रहा है, और मुझे लगा कि अपने अनुभव साझा कर उन लोगों तक पहुँचना चाहिए जो किसी उलझन या अवसाद से जूझ रहे हों। याद रखिए—अवसाद एक सामान्य अवस्था है, जिसका इलाज संभव है। पलायन नहीं, बल्कि डटकर सामना ही जीत का मार्ग है। जो मन से नहीं हारता, जीवन उससे कभी नहीं जीत पाता। उलझनों के पार ही प्रकाश है, जीवन है और नई शुरुआत की अनंत संभावनाएँ।

उलझनों के पार

जब घना अंधेरा हो, जब रात बहुत काली हो, जब हाथ को हाथ न सुझता हो और दिमाग किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में हो तब क्या चाहिए, केवल एक हल्की सी किरण जो इस कालिमा को चीर कर रख दे, और दिखा दे कोई रास्ता इन सब से बाहर आने का।

नमस्कार मित्रो, मैं आशा गुप्ता, एक नाट्य कलाकार, लेखिका, कवियित्री, समाज सेविका और इन सबसे ऊपर एक साधारण इंसान।

दु:ख-सुख, दर्द-हंसी के पल हमें भी छूकर निकलते हैं, कभी तनाव तो कभी अवसाद राह में साथ हो लेते हैं। यह साथ होते हैं तो पल बहुत बोझिल हो जाता है, कुछ अच्छा नहीं लगता, न खाना-पीना, न हंसना-बोलना, न घूमना-फिरना और न ही गीत-संगीत। बस एकांत ही प्रिय बन जाता है। ऐसे में कितना भी जतन कर लो, मन बाहर ही नहीं आना चाहता।

मैं हमेशा से एक लक्ष्य लेकर ही चली हूं और उसी को पाने के लिये मेहनत भी करती रही। सफलता भी मिली, और बहुत आगे तक गई भी, जहां पहुंचने का मैंने सपना भी नहीं देखा था। कहते हैं न समय एक सा नहीं रहता, मेरी जिंदगी में भी एक समय ऐसा आया जब सब कुछ अंधकारमय लगने लगा। धीरे धीरे सब कुछ कहीं पीछे छूट रहा था। लगा मेरा कोई वजूद ही नहीं है। मैं अवसाद में पड़ गई। मैं, जो दूसरों को हमेशा रास्ता दिखाती रही कि अवसाद या तनाव से कैसे बाहर आना है, और मुझे ही नहीं पता था कि इससे कैसे निकलूं।

मित्रो, अवसाद एक ऐसी चीज है जो आपको अपने आप को खोने का अनुभव कराती है। आपको लगता है कि आप अकेले हैं, और आपके पास कोई नहीं है। मैं काफी समय तक अवसाद में रही, इतना कि मैं स्वयं से उकताने लगी थी, फिर मैंने सीखा कि अवसाद से निकलने के लिए, आपको अपने आप को संयत रखना होगा। मैंने भी अपने आप को संयत रखने के लिए कई चीजें की। मैंने व्यायाम करना शुरू किया, जिससे मुझे अपने शरीर को मजबूत बनाने में मदद मिली। मैंने अपने दोस्तों और परिवार के साथ समय बिताना शुरू किया, जिससे मुझे अपने आप को अकेला महसूस नहीं हुआ और सबसे महत्वपूर्ण बात, मैंने अपने आप को माफ करना सीखा।

धीरे-धीरे, मैंने अपने आप को अवसाद से निकालना शुरू किया। मैंने अपने विचारों को बदलना शुरू किया, और मैंने अपने आप को सकारात्मक चीजों पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया। मैंने अपने लक्ष्यों को निर्धारित किया, और मैंने उन्हें प्राप्त करने के लिए काम करना शुरू किया। शुरू-शुरू में मन उचटता अवश्य था, पर मैं हंस कर मन को समझाती रही कि एक कदम और बस। और फिर, मैंने वापस से लिखना शुरू किया, अपने मन की हर वह बात कागज़ पर उतारती रही और पढ़ कर कागज़ फाड़ कर फैंक देती। फिर मैंने अपने अनुभवों को लिखना शुरू किया, और मैंने अपने विचारों को व्यक्त करना शुरू किया। लिखने से मुझे अपने आप को व्यक्त करने में मदद मिली, और यह मेरे लिए एक थेरेपी की तरह बन गया। इससे यह हुआ कि मन की उलझने धीरे-धीरे कम होने लगीं और मन प्रसन्न रहने लगा।

मैं जानती हूँ कि अवसाद से निकलना आसान नहीं है, लेकिन मैं आपको बताना चाहती हूँ कि यह संभव है। आपको बस अपने आप को संयत रखना होगा, और आपको अपने आप को माफ करना होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात, आपको अपने आप को अकेला नहीं महसूस करना होगा। आप अवसाद से निकल सकते हैं, और आप एक बेहतर जीवन जी सकते हैं।

इन दिनों, आकाशावाणी श्रीविजयपुरम (पोर्ट ब्लेयर) से मेरे द्वारा लिखित धारावाहिक नई सोच, नये सपने का प्रसारण हो रहा है। चूकिं मैं एक लेखिका हूँ, इसलिये मुझे लगा कि अपने अनुभवों को लोगों के साथ साझा करना चाहिए ताकि जो लोग किसी अवसाद या उलझन में घिरे हों, बाहर निकलने के लिए प्रेरित हो सकें। याद रखें, उलझनों के पार ही दुनिया है। यह एक सामान्य स्थिति है, जो आगे चल कर बीमारी का रूप धारण कर लेती है, और जिसका इलाज संभव है। मेरा मानना है कि कमजोर पड़ने से अच्छा है लड़कर स्थिति का सामना करें। जो डटकर सामना करता है वो कभी अपने मन से हारता नहीं।

रचयिता

आशा गुप्ता 'आशु'

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 




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