ज्योति जी का यात्रा-वृत्तांत
भूमिका
यात्रा-वृत्तांत केवल स्थानों का विवरण नहीं होते, वे मनुष्य के भीतर छिपे अनुभवों, संवेदनाओं और खोज की उस अनदेखी धारा को शब्द देते हैं जो अक्सर दैनिक जीवन की भीड़ में खो जाती है। एक छोटी-सी यात्रा भी जब मन में उतरकर कलम तक पहुँचती है, तो वह सीमाओं से परे एक नई दुनिया रच देती है—जहाँ लेखक और पाठक दोनों साथ-साथ चलते हैं, महसूस करते हैं, सीखते हैं। यही कारण है कि यात्रा-वृत्तांत लेखन की असीमितता का परिचय कराते हैं; इनमें हर मोड़, हर व्यक्ति, हर स्वाद और हर आकस्मिक घटना एक नए विचार की चिंगारी बन जाती है। इस यात्रा-वृत्तांत की शुरुआत ही पाठक के भीतर वही हलचल जगाने के लिए है—कि वह स्वयं भी अपनी यात्राओं को शब्दों में ढाले, अनुभवों को सहेजे, और दुनिया को अपनी नज़र से देखने का साहस करे।
थाईलैंड इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में सहभागिता
(एक अविस्मरणीय अनुभव)
विद्यार्थियो, गाँवों और परिवर्तन की चेतना से जुड़े ग्राम पाठशाला अभियान पर शोधपत्र तैयार करना मेरे लिए केवल एक शैक्षणिक कार्य नहीं था, बल्कि यह एक भावनात्मक यात्रा थी। पर यह यात्रा तब और भी ऐतिहासिक बन गई जब यह शोधपत्र थाईलैंड, बैंकॉक में आयोजित इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए चयनित हुआ। यह वही क्षण था जब मन में उत्साह, गर्व और थोड़ा सा रोमांच सब एक साथ उमड़ पड़े।
प्रस्थान
उत्साह और आशंकाओं का संगम
मेरी सह-शोधार्थी रूपाली वशिष्ठ और हमारे मार्गदर्शक डॉ. शैलेंद्र जी ने इस अवसर की सूचना दी थी। दोनों का पेपर चयनित होना हमारे परिश्रम की पुष्टि जैसा था।
जब मैंने परिवार को बताया कि मैं स्वयं बैंकॉक जाकर अपना पेपर प्रस्तुत करना चाहती हूँ, तो मेरे पति, ससुरजी और पूरे परिवार का समर्थन पाकर मन आश्वस्त हो गया।
6 नवंबर की रात 3 बजे, मैं और रूपाली मैम उत्साह से भरी आँखों और सपनों से भरे मन के साथ बैंकॉक के लिए रवाना हुए। 7 नवंबर की सुबह जब विमान ने थाईलैंड की धरती को छुआ, तो मन में एक हल्की-सी कंपन उठी—पहली विदेशी यात्रा का अनुभव!
एयरपोर्ट पर कॉन्फ्रेंस आयोजकों द्वारा भेजी गई कार हमें होटल ले गई, और वहाँ चिराग सर ने गर्मजोशी से स्वागत किया। एक दिन पहले पहुँचने के कारण थोड़ा विश्राम मिला, पर असली चुनौती तब सामने आई जब भोजन की तलाश शुरू हुई।
विदेश में यथा इच्छा भोजन
रोमांचक अनुभव
बैंकॉक का पहला अनुभव भोजन-संकट के रूप में सामने आया। जहाँ भी गए—हर तरफ नॉनवेज, और शाकाहारी भोजन के नाम पर केवल नाम मात्र विकल्प।
अंततः भूख के सामने झुककर एक बेस्वाद, बिना नमक-मिर्च वाला वेज पिज़्ज़ा खाकर सोना पड़ा।
अगले दिन बैंकॉक का सबसे बड़ा मॉल घूम आए, लेकिन वेज बर्गर तो जैसे किसी रहस्य की तरह ग़ायब था।
भाषा एक बड़ी बाधा थी—न हिंदी, न अंग्रेज़ी। “Potato Burger” कहते-कहते आवाज़ बैठ जाए पर कोई समझने वाला नहीं।
थक-हारकर स्ट्रॉबेरी और मैंगो शेक पीकर होटल लौटे।
रात में होटल से मँगाए वेज नूडल्स और राइस भी स्वादहीन थे, पर भूख के आगे स्वाद कहाँ टिक पाता है!
कॉन्फ्रेंस का दिन
भारतीय होने के गौरव की अनुभूति
8 नवंबर की सुबह, पारंपरिक भारतीय साड़ी पहनकर जब हम सेमिनार हॉल पहुँचे, तो मन में नई ऊर्जा थी।
यह कॉन्फ्रेंस 18 देशों के शोधार्थियों से भरी थी—विविध भाषाएँ, विविध विचार और ज्ञान का अद्भुत संगम।
दो दिन बाद पहली बार भारतीय स्वाद—पाकिस्तानी शेफ द्वारा बनाए छोले-चावल-रोटी—मिले तो जैसे मन खिल उठा।
विभिन्न देशों के प्रतिभागी अपनी भाषा में प्रेज़ेंटेशन दे रहे थे। इससे मन में यह विश्वास और मजबूती आई कि
“भाषा नहीं, भाव महत्वपूर्ण हैं—और अपनी मातृभाषा से बढ़कर कोई नहीं।”
इसलिए मैंने भी हिंदी में ही अपना पेपर प्रस्तुत किया।
ग्राम पाठशाला अभियान पर मेरे प्रस्तुतीकरण ने सबका ध्यान खींचा, और अनुवादक के माध्यम से इसे कई विदेशी प्रतिभागियों तक पहुँचाया गया।
जब मेरा नाम शिक्षा विभाग में Best Oral Presentation Award के लिए पुकारा गया, तो मेरे पति हर्ष भड़ाना की आँखों में चमकता गर्व मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान था।
अविस्मरणीय क्षणों की परतें
शोधपत्र को बुक ऑफ प्रोसिडिंग्स में प्रकाशित होते देख मन संतोष से भर गया।
हमने एक दिन और रुककर बैंकॉक की खूबसूरती को करीब से महसूस किया—
जंगल सफारी, डॉल्फिन शो, और रंगों से भरे आकर्षक बाजारों की चमकती रातें।
बच्चों के न होने का खालीपन उस पूरी यात्रा में हल्के-हल्के महसूस होता रहा। निश्चय किया कि अगली यात्रा उन्हें साथ लेकर ही करेंगे।
रात में राम टर्मिनल से इंडियन क्रूज़ की सवारी और असली देसी भोजन—मानो विदेश में भारत से अचानक मुलाकात हो गई हो।
होटल में वेज विकल्प न मिलने पर हम भारतीयों का “जुगाड़ू स्वभाव” खुलकर सामने आया—चावल, थोड़ी शक्कर और मक्खन मिलाकर बनाई गई साधारण-सी डिश, जो हमारे बुज़ुर्गों के शब्दों में ‘चावल भी बुरा’ थी, उसी दिन हमें सबसे स्वादिष्ट लगी।
घर वापसी
सम्मान की डोर
10 नवंबर को जब दिल्ली एयरपोर्ट पर कदम रखा, तो मन में एक ही विचार था—
“यह यात्रा सिर्फ विदेश यात्रा नहीं, आत्मविश्वास की उड़ान थी।”
घर पर परिवार, गाइड सुचिता उपाध्याय मैम और प्रियजनों ने गर्मजोशी से स्वागत किया।
समाज के वरिष्ठजनों—डॉ. विकास जतिन भाटी, कृष्णा नागर जी, बृजेश भाटी जी, अतुल प्रधान जी—सभी ने आशीर्वाद और शुभकामनाएँ दीं।
अंतिम अनुभूति
एक शोध से आगे की यात्रा
यह यात्रा केवल एक कॉन्फ्रेंस की कहानी नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, भारतीयता, भोजन-संकट, यात्राओं के रोमांच और मानवीय संवेदना से भरा एक पूरा अनुभव थी।
ग्राम पाठशाला मेरे लिए सिर्फ एक शोध विषय नहीं—यह संस्कार और सामाजिक जागरूकता का संदेश है।
मेरी इच्छा है कि यह पहल देश के हर गाँव तक पहुँचे और हर गाँव में एक निःशुल्क पुस्तकालय बने—
जहाँ बच्चे ज्ञान की रोशनी में अपने सपनों को पंख दे सकें। और! यह यात्रा मुझे सिखा गई कि विदेश में कदम भले ही नए हों, पर भारतीय विचार, संस्कृति और भाषा—हर मंच पर अपना सम्मान खुद बना लेते हैं।



मैं विनोद सुथार अध्यक्ष डॉक्टर कलाम फाउंडेशन ट्रस्ट ततारसर रायसिंहनगर, श्री गंगानगर ,राजस्थान आपको सूचना देना चाहता हूं की 1 जनवरी 2026 नववर्ष को इस भव्य और नवनिर्मित पुस्तकालय का लोकार्पण किया जाएगा!
ReplyDeleteयह पुस्तकालय 1 सितंबर 2015 को तात्कालिक जिला कलेक्टर श्री पी.सी. किसन IAS ,श्री गंगानगर के द्वारा पुराने पंचायती धर्मशाला में शुरू किया गया था जिसमें 110 से अधिक विद्यार्थी नियमित रूप से अध्ययन करते है इसे डिजिटल लाइब्रेरी के रूप में लोकार्पित किया जाएगा जिसमें आपकी समस्त ग्राम पाठशाला टीम सादर आमंत्रित है
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