बस राम राम ही हो सकी
भूमिका
यह एक ऐसे अवसर का विवरण है जब समाज सेवा के लिए एक संकल्पित विभूति शुभ चिंतन के लिए प्रस्तावित लोगों का सहभाग कराने के लिए प्रयासरत है और वह प्रयास इस सहभाग के अत्यावश्यक व्यक्ति के मिल जाने पर पूरा होता प्रतीत होता है, लेकिन एक अन्य आवश्यक की उपलब्धता ना होने पर बस राम-राम ही तक सीमित रह गई। ऐसे में स्तुति है तो प्रयासों की।
"बस राम-राम ही हो सकी..."
यह वाक्य उस क्षण को सहजता से अभिव्यक्त करता है जब दो सज्जन, अशोक जी और प्रशांत जी, एक शुभ चिंतन की ओर अग्रसर होने का प्रयास कर रहे थे।
अशोक जी, जो स्वयं एक गंभीर और समाजोन्मुख चिंतक हैं, प्रशांत जी से शिष्टाचार भेंट हेतु पधारे थे। इस भेंट का उद्देश्य केवल औपचारिक अभिवादन नहीं था, बल्कि इसे एक सार्थक सहभाग (Collaborative Dialogue) में परिवर्तित करने की कल्पना भी उनके मन में थी। इस सहभाग का विचार और भी प्रभावी होता यदि 'उलझन सुलझन' मासिक पत्रिका से संबद्ध एक अन्य सज्जन की उपस्थिति भी संभव हो पाती।
कृत्रिम बुद्धिमता से वस्तुस्थिति का चित्रण सिर्फ समझने भर के लिएप्रशांत जी मुख्य द्वार पर उपस्थित थे और उन्होंने सौजन्यपूर्वक आमंत्रण दिया कि अशोक जी कुछ समय प्रतीक्षा करें, क्योंकि वे शीघ्र ही लौटकर विमर्श हेतु समय देंगे। अशोक जी ने सहभाग के प्रस्तावित अन्य सदस्य को फ़ोन भी मिलाया, परंतु दुर्भाग्यवश वे उस समय उपलब्ध नहीं थे।
कृत्रिम बुद्धिमता से सृजित चित्रदोनों व्यक्तियों को अलग-अलग दायित्वों की व्यस्तता थी — अशोक जी को भी अन्य कार्यों हेतु जाना था, और प्रशांत जी भी तत्कालिक रूप से व्यस्त हो गए।
परिणामस्वरूप, यह शुभारंभ एक अनौपचारिक अभिवादन तक सीमित रह गया। फिर भी, इस संक्षिप्त संवाद और छोटे से प्रयास में एक बड़ी दृष्टि छिपी थी — संवाद, सहयोग और सृजनशीलता की।
इस प्रसंग की गरिमा में निहित संदेश:
यह घटना यह बताती है कि "कभी-कभी असफल प्रयास भी सफल दिशा की ओर संकेत करते हैं।" अशोक जी और प्रशांत जी का यह प्रयास भले ही उस क्षण में पूर्ण न हो सका, लेकिन यह स्पष्ट करता है कि जब सजग मन एक साथ आते हैं, तो संकल्प अवश्य जन्म लेते हैं।
यह छोटी सी मुलाक़ात दरअसल एक बड़े विमर्श की भूमिका थी — एक ऐसा विमर्श जो 'उलझनों को सुलझाने' वाले साहित्यिक व सामाजिक अभियान की ओर बढ़ सकता था।
सूचना स्रोत
अशोक चौधरी
पाठ्य उन्नयन
प्रस्तुति





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