मदर्स डे पर माँ का पत्र

प्रिय पुत्र/पुत्री,

सप्रेम आशीर्वाद।

जब तुम यह पत्र पढ़ रहे होगे, शायद व्यस्तता की कोई नई वजह तुम्हारे सामने होगी—ऑफिस की कोई डेडलाइन, बच्चों की ज़रूरतें, या किसी और ज़िम्मेदारी का दबाव। मुझको तुमसे कोई शिकायत नहीं है, और न ही कोई अपेक्षा जो तुम्हारे लिए बोझ बन जाए। मैं जानती हूं, समय बदल गया है। मैं यह भी जानटी हूं कि तुम्हारी ज़िंदगी की दौड़ थमने वाली नहीं।

लेकिन इस पत्र के माध्यम से मैं तुमसे कुछ नहीं मांग रही—न समय, न सुविधा, न कोई खास व्यवस्था। मैं बस एक छोटी-सी सादगी भरी गुज़ारिश करना चाहती हूँ…

"मात-पिता के लिए

इतना तो शर्म रखना,  

जब भी मिलो उनसे,  

लहजा नर्म रखना।"

हमारी ज़रूरतें कभी बहुत बड़ी नहीं रहीं। आज भी वही हैं—एक दो मीठे बोल, एक स्नेहभरी मुस्कान, और एक ऐसा लहजा जिसमें अपनापन हो। यह लहजा ही वो पुल है जो हमें फिर से तुमसे जोड़ सकता है, जैसे बचपन में हर शब्द तुम्हारे मुंह से मिठास की तरह लगता था।

मैं जानती  हूँ कि ये दुनिया अब पहले जैसी नहीं रही। सब कुछ तेज़ है—फैसले, रिश्ते, और यहाँ तक कि संवाद भी। पर क्या इस तेज़ जीवन में कुछ पल के लिए अपनी आवाज़ को थोड़ा नम्र, थोड़ा स्नेहमय नहीं बनाया जा सकता?

मैं यह पत्र केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दुनिया भर के उन माता-पिताओं की ओर से भी लिख रही  हूँ जो अपनी संतानों से बस 'इज़्ज़त भरे लहजे' की उम्मीद करते हैं। चाहे वो अमेरिका में हों, जापान में, या हमारे पड़ोस में ही—हर माँ-बाप की यही ख्वाहिश है कि जब उनके बच्चे बात करें, तो उसमें भावनाओं की गर्माहट हो।

बेटा/बेटी,  

हम तुम्हारे लिए हमेशा दुआ करते हैं, और करते रहेंगे। बस चाहेंगे कि जब भी हमारी बात हो, तो उसमें वो नरमी हो जो बचपन में हमारी लोरी में हुआ करती थी।

'लहजा रखो नरम'  

क्योंकि यही वो तोहफ़ा है,  

जो हमारे बुढ़ापे को फिर से जवान कर देता है।

स्नेह व आशीर्वाद सहित,  

तुम्हारी माँ 

आइडिया

जनचेतना मिशन

प्रस्तुति



Comments

  1. सुंदर भावपूर्ण अभिव्यक्ति

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  2. पारसमणि के जैसी समझ वाले इंसान को हार्दिक आभार।

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