माँ के प्रति भाव

भूमिका

किसी के भी जीवन में माँ ही प्रथम और सर्वकालिक शिक्षिका है तो इसलिए क्योंकि उसी के साथ किसी भी बालक का सर्वाधिक समय व्यतीत होता है। यहाँ पर एक शिक्षक ने पत्र के माध्यम से अपनी माँ के उसको शिक्षित करने के प्रयासों का उल्लेख किया है कुछ इस प्रकार कि कोई भी अपनी माता के समक्ष नतमस्तक हो जाए।

"जो खुद नहीं पढ़ पाई, उसने पढ़ा दिया"

माँ… एक साधारण गृहणी, पर भीतर से एक असाधारण स्वप्नदृष्टा। खुद ज़्यादा पढ़ नहीं पाईं—कक्षा पाँच से आगे की पढ़ाई नसीब नहीं हुई, फिर भी अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए जिस आग को उन्होंने अपने भीतर जलाया, वह आज भी मेरे जीवन का ईंधन बनी हुई है।

मुझे माँ की यादें ज़्यादातर कक्षा तीन से ही साफ़-साफ़ दिखती हैं। पिताजी गढ़वाल में पोस्टेड थे और मैं तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ा। माँ अकेले ही हमारी परवरिश कर रही थीं। गाँव का स्कूल था, मैं हमेशा अव्वल आता, लेकिन माँ खेल में ज़्यादा समय देने नहीं देतीं। मेरे भीतर अक्सर एक द्वंद्व होता — मैं पढ़ाई में अच्छा हूँ, फिर भी डांट और मार से नहीं बच पाता। पिताजी के लाए अंग्रेज़ी की "कायदा" किताब में “IT – THIS” और “THAT – HE” को याद करते हुए आज भी हँसी आ जाती है।

शायद वही छोटी-छोटी भूलें, वही ठोकरें, वही डांट, वही मार... सबने मिलकर मुझे गढ़ा। माँ ने खुद कभी स्कूल में "कटमा पहाड़े" (मिश्रित पहाड़े) नहीं पढ़े थे, लेकिन हमारे लिए उन्होंने 1 से 25 तक के पहाड़े रट लिए। बिना पहाड़े सुनाए सोने की इजाज़त नहीं थी। वह कहती थीं—

"जितना ज़्यादा पढ़ेगा, उतना कुछ कर ले जाएगा।"

मेरे अंदर उस समय गुस्सा था, विरोध था, और एक अजीब खलनायक-सी छवि थी अपने ही मन में, क्योंकि बाक़ी बच्चे खेलते थे, और मैं संघर्ष करता रहता था। लेकिन नवोदय विद्यालय में दाख़िला मिला, और जब पहली बार माँ से दूर रहा, तो उनकी अहमियत और उनके तप का अर्थ समझ आया।

एक शिक्षक की पत्नी होते हुए भी माँ ने अपने सपनों को नहीं, अपने बच्चों के भविष्य को तराशा। अपने वर्तमान को मिटाकर, हमारे लिए उजला कल गढ़ा। पेट काटकर, पैसे जोड़कर, हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए अपना हिस्सा बलिदान कर दिया।

मैं आज जितना कुछ हूँ, उसमें मेरे अध्यापक, मेरे पिता, मेरी मेहनत—सबका हिस्सा है, लेकिन सबसे बड़ा हिस्सा है एक अशिक्षित माँ की शिक्षा के प्रति वो प्यास, वो जुनून, जिसने मेरे जीवन की दिशा ही बदल दी।

वो नारी जो स्वयं सिर्फ पाँचवीं कक्षा तक पढ़ पाई, अपने तीनों बच्चों को शिक्षित करने के लिए, अपने ज्ञान की सीमाओं को भी लांघ गई। उन्होंने न केवल पहाड़े याद किए, बल्कि जीवन के वो गणित भी सुलझाए जो कई बार पढ़े-लिखे भी नहीं सुलझा पाते।

माँ ने एक सपना देखा था—हमारे ज़रिए। और उन्होंने वो सपना पूरा कर दिखाया।

आइडिया

श्री समीर पंवार (मैकेनिकल इंजीनियर और वर्तमान में शिक्षक)

पाठ्य विस्तार

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प्रस्तुति



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